मलिक मोहम्मद जायसी का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं शिक्षा दीक्षा भाषा शैली और काव्यगत विशेषताएँ

मलिक मोहम्मद जायसी का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं शिक्षा दीक्षा भाषा शैली और काव्यगत विशेषताएँ

जन्म और स्थान:

मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म अनुमानतः 1492 ईसवी के आसपास हुआ था। उनका मूल निवास उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले का जायस नगर था, जिसकी पुष्टि उनके काव्य की पंक्ति "जायस नगर मोर अस्थानू" से भली-भांति हो जाती है। वे जन्म से ही अत्यंत निर्धन और साधारण परिवेश के थे। बचपन में भयंकर चेचक के प्रकोप के कारण वे रूपहीन और एक आंख से काने हो गए थे, किंतु उनकी अंतर्दृष्टि अत्यंत प्रखर थी।

गुरु और संप्रदाय:

जायसी निर्गुण भक्ति धारा की प्रेमाश्रयी (सूफी) शाखा के सर्वप्रमुख और प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपने काव्यों में अपने गुरुओं का अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है। उनके प्रमुख दीक्षा गुरु सूफी फकीर शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन) तथा सैयद अशरफ जहाँगीर थे। उन्होंने चिश्ती संप्रदाय की सूफी रहस्यवादी परंपरा को अपनाया और लौकिक प्रेम (इश्क मिजाजी) के माध्यम से अलौकिक प्रेम (इश्क हकीकी) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया।

काव्यगत विशेषताएं:

जायसी का काव्य ज्ञान और प्रेम का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने हिंदू लोककथाओं और मिथकों को अपने सूफी दर्शन का आधार बनाया। उनके काव्य में अद्वैतवाद और वहदत-उल-वजूद (ईश्वर की सर्वव्यापकता) का सिद्धांत प्रमुखता से उभर कर सामने आता है। उन्होंने प्रकृति का अत्यंत सजीव मानवीकरण किया है और उनका विरह वर्णन हिंदी साहित्य की अद्वितीय धरोहर है।

भाषा और शैली:

जायसी की भाषा संस्कारित या दरबारी नहीं, बल्कि लोक प्रचलित ठेंठ ग्रामीण अवधी है। इसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का अत्यंत सहज प्रयोग हुआ है। शैली की दृष्टि से उन्होंने फारसी की मसनवी शैली को अपनाया, जिसमें सर्गों के स्थान पर 'खंड' होते हैं और आरंभ में ईश-वंदना व तत्कालीन शासक की प्रशंसा होती है। छंद विधान में उन्होंने दोहा-चौपाई शैली (कड़वक बद्ध) का सर्वोत्कृष्ट प्रयोग किया है, जिसमें प्रायः सात चौपाइयों के बाद एक दोहा रखा गया है।

​प्रमुख रचनाएं एवं उनका रचनाकाल

  • ​पद्मावत (1540 ईसवी)
  • ​आखिरी कलाम (1529 ईसवी)
  • ​अखरावट (1504 से 1529 ईसवी के मध्य अनुमानित)
  • ​चित्ररेखा (1540 ईसवी के आसपास अनुमानित)
  • ​कान्हावत (रचनाकाल अज्ञात)
  • ​कहरनामा (रचनाकाल अज्ञात)
  • ​मसलानामा (रचनाकाल अज्ञात)

​इतिहास लेखकों के प्रमुख मत

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार - "जायसी के शृंगार में मानसिक पक्ष प्रधान है, शारीरिक गौण है।" तथा "कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुई परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था। प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी। यह जायसी द्वारा पूरी हुई।" 
 
विजयदेव नारायण साही के अनुसार - "पद्मावत हिंदी में अपने ढंग की अकेली ट्रैजिक (त्रासद) कृति है।" 
 
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार - "जायसी का काव्य अत्यंत मार्मिक है, यह हिंदू-मुस्लिम हृदय को आमने-सामने करके अजनबीपन मिटाने वाला काव्य है।"

प्रश्न 1: मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य दर्शन, उनकी सूफी साधना के क्रमिक सोपानों, तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक समन्वय में उनके ऐतिहासिक योगदान तथा उनकी ठेठ अवधी भाषा की उस विशिष्टता का सूक्ष्म विश्लेषण कीजिए, जिसने उन्हें प्रेमाश्रयी शाखा का सिरमौर बना दिया?

​जायसी की काव्य चेतना मूल रूप से सूफी दर्शन के तसव्वुफ पर आधारित है। उन्होंने भारतीय अद्वैतवाद और इस्लामी एकेश्वरवाद के मध्य एक ऐसा सुदृढ़ सेतु निर्मित किया जो विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम पर टिका है। उनके काव्य में लौकिक प्रेम की पीड़ा अंततः ईश्वरीय प्रेम की परम अवस्था में परिणत हो जाती है, जिसे सूफी पारिभाषिक शब्दावली में इश्क मिजाजी से इश्क हकीकी की ओर प्रस्थान कहा जाता है। उन्होंने विशुद्ध भारतीय लोक कथाओं को अपने दार्शनिक चिंतन का मूल आधार बनाकर एक नवीन परंपरा की नींव रखी।

​जायसी की साधना पद्धति में सूफी दर्शन के चार प्रमुख मुकामों या अवस्थाओं का अत्यंत प्रामाणिक और मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। ये चार आध्यात्मिक सोपान हैं- शरीअत (धर्म ग्रंथों का बाह्य आचरण), तरीकत (हृदय की आंतरिक शुद्धता), हकीकत (परम सत्य का बोध) और मारफत (ईश्वर से पूर्ण एकाकार)। उनके काव्य में नायक इन्हीं कठिन सोपानों से गुजरते हुए अपनी आध्यात्मिक पूर्णता और मोक्ष को प्राप्त करता है। इस संपूर्ण साधना यात्रा में शैतान या सांसारिक माया बाधक बनती है जिसे उन्होंने अपने काव्यों में विभिन्न जीवंत प्रतीकों के माध्यम से अत्यंत कुशलता से दर्शाया है। 
 
​तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में जायसी का ऐतिहासिक योगदान हिंदू-मुस्लिम एकता और वृहद सांस्कृतिक समन्वय की दृष्टि से नितांत अभूतपूर्व है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी स्पष्ट किया है कि जायसी ने मुसलमानों के सामने हिंदुओं की घर-आंगन की कहानियों को उन्हीं की बोली में प्रस्तुत करके दोनों संप्रदायों के बीच की वैचारिक दूरी को पाटने का युगांतरकारी कार्य किया। उन्होंने भारतीय पर्वों, ऋतुओं, और पारिवारिक रीति-रिवाजों का ऐसा सजीव वर्णन किया है जो पूर्णतः भारतीय मिट्टी की सोंधी गंध से सराबोर प्रतीत होता है।

 

​भाषा और शिल्प के स्तर पर जायसी की सबसे बड़ी और अद्वितीय उपलब्धि उनकी लोक प्रचलित ठेठ ग्रामीण अवधी का नैसर्गिक प्रयोग है। गोस्वामी तुलसीदास की अवधी जहाँ तत्सम प्रधान और संस्कारित है, वहीं जायसी की भाषा अकृत्रिम, मुहावरों, लोकोक्तियों और विशुद्ध ग्रामीण शब्दों से परिपूर्ण है। उन्होंने कड़वक बद्ध प्रबंध शैली का प्रयोग किया जिसमें सात चौपाइयों के बाद एक दोहा रखा जाता है। उनकी इस ग्रामीण भाषा में एक ऐसा नैसर्गिक प्रवाह, लयात्मकता और मिठास है जो तत्कालीन जनमानस की वास्तविक और हृदयगत अभिव्यक्ति प्रतीत होती है।

 

​विप्रलंभ शृंगार या वियोग वर्णन के क्षेत्र में जायसी की लेखनी अपनी चरम ऊंचाइयों को स्पर्श करती है, जिसका कोई अन्य सानी नहीं है। उनके काव्य में उद्घाटित नागमती वियोग वर्णन हिंदी साहित्य की सर्वोत्कृष्ट अमूल्य निधि माना जाता है, जिसमें बारहमासा पद्धति के माध्यम से विरह की जो अत्यंत मार्मिक, संयत और स्वाभाविक पीड़ा उकेरी गई है, वह अन्यत्र सर्वथा दुर्लभ है। यह विरह केवल दैहिक या शारीरिक नहीं है, बल्कि इसमें एक ऐसी गहरी आध्यात्मिक तड़प समाहित है जो आत्मा का परमात्मा से मिलन की उत्कट और शाश्वत लालसा को अभिव्यक्त करती है।

 

​अलंकारों और रस के सहज परिपाक में जायसी ने अत्यधिक कुशलता और मनोवैज्ञानिक समझ का परिचय दिया है। उनके संपूर्ण काव्य में हेतुत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अलंकार का सर्वाधिक तथा अत्यंत चमत्कारिक प्रयोग देखने को मिलता है। रस की दृष्टि से उन्होंने यद्यपि शृंगार, वीर, और भयानक आदि अनेक रसों का सफल परिपाक किया है, तथापि उनका मुख्य और प्राणवान रस विप्रलंभ शृंगार और शांत रस ही है। वियोग के चित्रण में उन्होंने विरह ताप का ऐसा अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है जो स्पष्टतः फारसी प्रभाव को दर्शाता है, किंतु फिर भी उसमें भारतीय संवेदना की पूर्ण गहराई और मर्यादा सर्वत्र विद्यमान रहती है।

प्रश्न 2: 'पद्मावत' को हिंदी साहित्य का प्रथम प्रामाणिक महाकाव्य तथा एक सर्वोत्कृष्ट प्रतीकात्मक और त्रासद (ट्रैजिक) प्रेमाख्यान क्यों माना जाता है? इसके दार्शनिक आधार, ऐतिहासिक-काल्पनिक समन्वय, और नागमती वियोग वर्णन की साहित्यिक महत्ता का सर्वांगीण और तात्विक विवेचन कीजिए।

​'पद्मावत' हिंदी साहित्य के पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) की प्रेमाश्रयी शाखा का सर्वश्रेष्ठ और प्रथम प्रामाणिक महाकाव्य है, जिसकी कालजयी रचना 1540 ईसवी में संपन्न हुई। इसमें चित्तौड़ के पराक्रमी राजा रत्नसेन और सिंहल द्वीप की अलौकिक सौंदर्य संपन्न राजकुमारी पद्मावती के प्रेम, संघर्ष, विवाह और उसके पश्चात् के हृदयविदारक त्रासद अंत का अत्यंत विस्तृत वर्णन है। यह महाकाव्य मूलतः फारसी की मसनवी शैली में लिपिबद्ध किया गया है, किंतु इसकी वैचारिक आत्मा पूर्णतः भारतीय अद्वैत वेदांत से अनुप्राणित है। इसमें कुल 57 खंड हैं और यह दोहा-चौपाई छंद में कड़वक पद्धति पर आधारित होने के कारण महाकाव्यात्मक गरिमा को धारण करता है। 

 

​यह महाकाव्य एक अत्यंत उत्कृष्ट और बहुआयामी प्रतीकात्मक (अन्यौक्ति) काव्य है, जिसके उपसंहार में स्वयं जायसी ने इसके सभी गूढ़ प्रतीकों का रहस्योद्घाटन किया है। इस ग्रंथ में चित्तौड़ मानव शरीर का, राजा रत्नसेन चंचल मन (आत्मा) का, सिंहल द्वीप हृदय का, और राजकुमारी पद्मावती परमसत्ता या सात्विक बुद्धि (परमात्मा) का शाश्वत प्रतीक है। इसी प्रकार सुआ (हीरामन तोता) मार्गदर्शक गुरु का, नागमती दुनिया-धंधा (सांसारिक आकर्षण) का, राघव चेतन शैतान का, और सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी भ्रमित करने वाली माया का प्रतीक है। इन प्रतीकों के माध्यम से एक लौकिक कथा के आवरण में पारलौकिक साधना का गहरा रहस्य अत्यंत बारीकी से पिरोया गया है।

 

​पद्मावत की संपूर्ण कथावस्तु को अध्ययन की दृष्टि से दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है, जो इसके शिल्प की विशिष्टता है। इसका पूर्वार्ध, जिसमें राजा रत्नसेन का जोगी बनकर सिंहल द्वीप जाना और पद्मावती से विवाह संपन्न करना शामिल है, पूर्णतः कल्पना-प्रसूत और भारतीय लोककथाओं पर आधारित है। जबकि इसका उत्तरार्ध, जिसमें अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर भीषण आक्रमण, छल-कपट और राजपूतानियों के जौहर का प्रसंग है, वह ऐतिहासिक तथ्यों पर मजबूती से आधारित है। जायसी ने इतिहास और कल्पना का ऐसा अद्भुत रासायनिक समन्वय किया है कि दोनों हिस्से एक-दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं।

 

​भारतीय महाकाव्यों की सामान्य और पारंपरिक प्रवृत्ति सदैव सुखांत (सकारात्मक अंत वाली) रही है, किंतु पद्मावत अपने समापन में एक गहरी त्रासद (ट्रैजिक) चेतना को जन्म देता है, जो इसे विशिष्ट बनाता है। राजा रत्नसेन की युद्ध में वीरगति और उसके बाद पद्मावती तथा नागमती का अग्नि में सती हो जाना, और अंततः विजेता अलाउद्दीन खिलजी के हाथ में केवल राख का ढेर लगना - यह सब सांसारिक मोह-माया की चरम नश्वरता को उद्घाटित करता है। प्रसिद्ध आलोचक विजयदेव नारायण साही ने इसी कारण इसे हिंदी साहित्य की अकेली और अद्वितीय त्रासद कृति माना है जो मनुष्य की अस्तित्वगत पीड़ा को रेखांकित करती है।

 

​इस महाकाव्य का 'नागमती वियोग खंड' संपूर्ण हिंदी साहित्य के इतिहास में विरह वर्णन की अमूल्य और अद्वितीय निधि के रूप में प्रतिष्ठित है। इसमें जायसी ने पारंपरिक बारहमासा पद्धति का अत्यंत सजीव उपयोग करते हुए आषाढ़ मास से नागमती के विरह ताप का वर्णन आरंभ किया है। यह विरह किसी सामान्य स्त्री का नहीं, बल्कि भारतीय नारी की गरिमा, उसके अडिग संयम और उसकी मूक पीड़ा का अत्यंत स्वाभाविक आख्यान है। इसमें फारसी काव्य की तरह ऊहात्मकता या अतिशयोक्ति के भद्देपन का पूर्णतः अभाव है, बल्कि यह विरह ताप करुणा का अत्यंत सात्विक चित्रण प्रस्तुत करता है।

 

​दार्शनिक धरातल पर समीक्षा की जाए तो पद्मावत सूफी अद्वैतवाद (वहदत-उल-वजूद) की अत्यंत तार्किक स्थापना करता है, जिसके अनुसार संसार का प्रत्येक कण उसी एक परमसत्ता के नूर (दिव्य प्रकाश) से प्रकाशित है। जब राजा रत्नसेन पद्मावती के अलौकिक रूप का दर्शन करता है और मूर्छित हो जाता है, तो वह वस्तुतः उसी ईश्वरीय सौंदर्य का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। काव्य में जगह-जगह पर ऐसे मार्मिक प्रसंग आए हैं जहां लौकिक प्रेम की समस्त भौतिक सीमाएं टूट जाती हैं और वह विशुद्ध ईश्वरीय आराधना में विलीन हो जाता है, जो इसे एक महान आध्यात्मिक ग्रंथ का दर्जा दिलाता है।

प्रश्न 3: 'अखरावट' को जायसी के गंभीर दार्शनिक चिंतन और सूफी सिद्धांतों की परिचयात्मक कुंजी क्यों कहा जाता है? वर्णमाला के अक्षरों के माध्यम से रचित इस विशिष्ट ग्रंथ में निहित ब्रह्मांड की उत्पत्ति, जीव, ईश्वर और सृष्टि के परस्पर संबंधों की विशद और तात्विक समीक्षा कीजिए।

​'अखरावट' मलिक मोहम्मद जायसी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण, वैचारिक और सैद्धांतिक-दार्शनिक काव्य रचना है, जो उनके रहस्यवादी चिंतन को उद्घाटित करती है। इस ग्रंथ का नामकरण इसके वर्ण्य-विषय और विशिष्ट शैली के आधार पर किया गया है। इसमें देवनागरी वर्णमाला के एक-एक अक्षर (अक्षर या आखर) को लेकर सूफी दर्शन के गहन सैद्धांतिक नियमों, ईश्वर की अपार महिमा, और मानव जीवन के वास्तविक आध्यात्मिक उद्देश्यों का तार्किक प्रतिपादन किया गया है। यह रचना आकार में यद्यपि छोटी प्रतीत होती है, किंतु वैचारिक गहराई की दृष्टि से यह जायसी के संपूर्ण दार्शनिक चिंतन का निचोड़ प्रस्तुत करती है।

 

​अखरावट में मुख्य रूप से ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना (ब्रह्मांडोत्पत्ति के सिद्धांत) का अत्यंत सूक्ष्म, क्रमबद्ध और तात्विक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। जायसी ने सूफी विचारधारा के अनुसार यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि परमेश्वर ने इस संपूर्ण जगत की रचना अपने भीतर उत्पन्न हुए प्रेम के वशीभूत होकर की है। उन्होंने 'मोहम्मद' को इस संपूर्ण सृष्टि का प्रथम कारण माना है और यह बताया है कि ईश्वर ने सर्वप्रथम मोहम्मद के नूर (दिव्य प्रकाश) की रचना की और फिर उसी नूर से इस संपूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। यह इस्लामी दर्शन का अत्यंत गूढ़ आधार स्तंभ है।

 

​इस काव्य कृति की सबसे बड़ी और अनूठी विशेषता इसकी वर्णमाला आधारित संरचना (अल्फाबेटिक एक्रोस्टिक शैली) है, जो उस कालखंड में एक अभिनव प्रयोग था। कवि ने 'अ', 'ब', 'क', 'ख' आदि देवनागरी के प्रत्येक अक्षर से प्रारंभ होने वाले शब्दों के माध्यम से अत्यंत गंभीर उपदेशात्मक बातें कही हैं। एक-एक अक्षर के बहाने कवि ने जीव, जगत, माया, ब्रह्म, और मोक्ष जैसे जटिल विषयों पर अपनी सुलझी हुई दार्शनिक दृष्टि डाली है। यह विशिष्ट शैली न केवल कंठस्थ करने में सुलभ थी, बल्कि जनसामान्य तक गूढ़ सूफी ज्ञान को अत्यंत रोचक तरीके से पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी सिद्ध हुई।

 

​अखरावट में जीव (मनुष्य की आत्मा) और ब्रह्म (परमात्मा) के शाश्वत संबंध को अत्यंत स्पष्टता और तार्किकता के साथ निरूपित किया गया है। जायसी ने यह बताया है कि जीव मूल रूप से उसी अनंत परमसत्ता का एक अभिन्न अंश है, किंतु माया के सघन आवरण और सांसारिक अज्ञान के कारण वह अपने इस मूल और पवित्र स्वरूप को विस्मृत कर चुका है। इस ग्रंथ में गुरु की महत्ता को सर्वोच्च और अपरिहार्य स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु ही वह एकमात्र मार्गदर्शक है जो जीव के भीतर छाए अज्ञान के अंधकार को नष्ट करके उसे ईश्वर से पुनः साक्षात्कार करवा सकता है।

 

​दार्शनिक सिद्धांतों के गंभीर विवेचन के साथ-साथ 'अखरावट' एक अत्यंत नीतिपरक और उपदेशात्मक ग्रंथ का रूप भी धारण कर लेता है। इसमें मनुष्य को अहंकार, लोभ, मोह, ईर्ष्या और क्रोध जैसी तामसिक प्रवृत्तियों से सर्वथा दूर रहने की कठोर चेतावनी दी गई है। जायसी ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह दृश्यमान संसार पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है और मृत्यु एक अटल सत्य है, इसलिए मनुष्य को व्यर्थ के विवादों का त्याग करके अपने अंतर्मन की शुद्धि करनी चाहिए। यह नैतिकता सीधे तौर पर सूफी दर्शन के 'तरीकत' (आचार-शुद्धि) वाले सोपान से एकाकार होती है।

 

​भाषा विज्ञान की दृष्टि से यदि विश्लेषण किया जाए तो यह ग्रंथ प्रौढ़, वैचारिक और पारिभाषिक अवधी का एक उत्कृष्ट तथा परिष्कृत नमूना है। चूँकि इस ग्रंथ का मूल विषय दार्शनिक और सैद्धांतिक है, इसलिए इसमें पद्मावत जैसी कोमलकांत और भावात्मक पदावली के स्थान पर थोड़ी वैचारिक गंभीरता और शब्दावली की सघनता स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। जायसी ने अरबी और फारसी के पारिभाषिक सूफी शब्दों को ठेठ ग्रामीण अवधी के सांचे में इस अद्भुत कौशल के साथ ढाला है कि वे शब्द विदेशी न लगकर भारतीय लोक-मानस के अपने शब्द प्रतीत होने लगते हैं।

प्रश्न 4: 'आखिरी कलाम' में वर्णित इस्लाम के पारलौकिक सिद्धांतों, विशेषकर 'कयामत के दिन' (प्रलय) के महादृश्य और मृत्यु के पश्चात जीव की अवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। तत्कालीन मुगल शासक बाबर के संदर्भ में इस ग्रंथ की ऐतिहासिक महत्ता तथा इसके भाषाई प्रयोगों का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।

​'आखिरी कलाम' मलिक मोहम्मद जायसी की एक सर्वथा विशिष्ट और विशुद्ध इस्लामी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित रचना है, जो उनके व्यक्तित्व के एक अलग आयाम को प्रस्तुत करती है। इस कृति का सर्वमान्य रचनाकाल 1529 ईसवी (936 हिजरी) माना जाता है। इस ऐतिहासिक ग्रंथ के आरंभ में तत्कालीन मुग़ल बादशाह बाबर की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता और रचनाकाल को पुष्ट करने का सबसे मजबूत और अकाट्य आधार है। इस कृति का मूल और एकमात्र विषय इस्लाम धर्म में वर्णित 'कयामत' (प्रलय) और मृत्यु के बाद के जीवन का अत्यंत विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करना है।

 

​इस ग्रंथ में 'कयामत के दिन' (रोज-ए-महशर या प्रलय के दिन) का अत्यंत जीवंत, भयावह और रोम-हर्षक वर्णन किया गया है जो पाठक को सिहरन से भर देता है। इस्लामी धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब यह दुनिया पूर्णतः समाप्त हो जाएगी, तब एक दिन सभी मृतकों को उनकी पुरानी कब्रों से दोबारा जीवित करके उठाया जाएगा और उनके द्वारा किए गए अच्छे-बुरे कर्मों का पाई-पाई का हिसाब होगा। जायसी ने अपनी ठेठ अवधी भाषा में इस पूरे दृश्य का ऐसा चित्रांकन किया है जो पाठक के मन में ईश्वर के कठोर न्याय के प्रति प्रचंड भय और गहरी श्रद्धा दोनों एक साथ उत्पन्न करता है।

 

​'आखिरी कलाम' में इस्लाम के अंतिम पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की सिफारिश या क्षमादान के सिद्धांत को भी अत्यंत प्रमुखता और भावना के साथ उभारा गया है। जायसी ने यह मार्मिक वर्णन किया है कि कयामत के दिन जब सभी लोग भयंकर ताप और अपने कर्मों के कठोर दंड के भय से त्रस्त होंगे, तब केवल हजरत मोहम्मद ही आगे आकर अपने अनुयायियों और सच्चे जीवों के लिए परवरदिगार से क्षमादान की सिफारिश करेंगे। यह महत्वपूर्ण बिंदु सूफी दर्शन में पैगंबर के प्रति अगाध प्रेम और उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करने का महान कार्य करता है।

 

​तात्विक दृष्टि से यह कृति मूल रूप से गहरे वैराग्य और भौतिक संसार की नश्वरता का अत्यंत प्रभावशाली संदेश देती है। जायसी ने मानव जाति को बार-बार यह चेतावनी दी है कि यह रंग-बिरंगा भौतिक संसार केवल कुछ दिनों की एक सराय के समान है और एक न एक दिन हर जीव को मौत का कसैला स्वाद अवश्य चखना है। कब्र की भयानक तन्हाई, मुनकर-नकीर (पूछताछ करने वाले फरिश्तों) द्वारा हिसाब लिए जाने की कठोर प्रक्रिया और जहन्नुम (नरक) की प्रलयंकारी आग का सजीव चित्रण करके कवि ने मानव मात्र को सत्य मार्ग पर चलने का कठोर उपदेश दिया है।

 

​ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह ग्रंथ इसलिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें मुगल सम्राट बाबर के न्याय, शौर्य और उसके प्रारंभिक राज्यकाल का समकालीन और प्रामाणिक वर्णन उपलब्ध होता है। जायसी ने 'शाहे-वक्त' के रूप में बाबर की जो प्रशंसा की है, उससे यह ऐतिहासिक तथ्य सिद्ध होता है कि जायसी का रचनाकाल लोदी वंश के अंत और मुगल साम्राज्य की स्थापना के उथल-पुथल भरे संधिकाल में था। इससे हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों को भक्तिकाल की समय-सीमा और तत्कालीन राजनीतिक पृष्ठभूमि के सटीक निर्धारण में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त होते हैं।

 

​भाषा के स्तर पर 'आखिरी कलाम' अपने आप में एक अत्यंत अद्भुत और साहसिक प्रयोग है, जिसका मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। इसमें इस्लामी धर्मशास्त्र (कुरान और हदीस) के अत्यंत गूढ़ और पारलौकिक रहस्यों को अवधी जैसी विशुद्ध भारतीय और ग्रामीण भाषा में अनूदित करने का प्रयास किया गया है। अरबी-फारसी के धार्मिक शब्दों का अवधीकरण करके जायसी ने यह सिद्ध कर दिया कि परमसत्ता का धार्मिक संदेश किसी विशिष्ट भाषा का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह लोकभाषा के माध्यम से भी सीधे जनमानस की आत्मा तक पहुंच सकता है। यह उनकी असाधारण भाषाई क्षमता का प्रमाण है।

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