कबीर का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं शिक्षा दीक्षा भाषा शैली और काव्यगत विशेषताएँ

कबीर का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं शिक्षा दीक्षा भाषा शैली और काव्यगत विशेषताएँ

​हिंदी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि, समाज सुधारक और महान विचारक कबीरदास का स्थान भारतीय साहित्य में अद्वितीय है। उनका काव्य केवल शब्दों की बाजीगरी नहीं, बल्कि जीवन के कठोर सत्यों, आध्यात्मिक अनुभूतियों और सामाजिक कुरीतियों पर किया गया सबसे तीखा प्रहार है। हिंदी साहित्य में कबीर का मूल्यांकन एक कवि से अधिक एक 'युग-प्रवर्तक' के रूप में किया जाता है।

 जीवन परिचय

​कबीरदास के जन्म और मृत्यु को लेकर हिंदी साहित्य में अनेक किंवदंतियाँ और मतभेद हैं, परंतु सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्यों और प्रामाणिक साक्ष्यों के आधार पर उनका जीवनकाल 15वीं शताब्दी माना जाता है।

• ​जन्म: कबीर का जन्म सन् 1398 ई.में काशी (वाराणसी) में हुआ था। उनके जन्म के विषय में यह प्रसिद्ध उक्ति प्रामाणिक मानी जाती है: 

"चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥" 
(विक्रम संवत 1455 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन सोमवार को कबीरदास जी का प्राकट्य हुआ।)

• ​पालन-पोषण: जनश्रुति के अनुसार वे एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्मे थे, जिसने लोक-लाज के भय से उन्हें काशी के लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से नीरू और नीमा नामक मुस्लिम जुलाहा दंपति ने उन्हें उठाया और उनका पालन-पोषण किया। कबीर ने स्वयं अपने काव्य में अपने जुलाहा होने की पुष्टि की है: 

"जाति जुलाहा नाम कबीरा, बनि बनि फिरो उदासी।" 
( मेरी जाति जुलाहा है और नाम कबीर है, मैं ईश्वर के प्रेम और वैराग्य में लीन होकर घूमता हूँ।)

• ​गुरु: कबीरदास जी के गुरु रामानंद थे। स्वामी रामानंद से ही उन्होंने 'राम' नाम का गुरुमंत्र प्राप्त किया था।

• ​पारिवारिक जीवन: कबीर का विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ था, जिनसे उनके दो संताने हुईं— पुत्र कमाल और पुत्री कमाली

• ​मृत्यु: कबीर का देहावसान सन् 1518 ई. में मगहर में हुआ। उस समय यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है। इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए ही कबीर अपने अंतिम समय में मगहर चले गए थे: 

"जौ कासी तन तजै कबीरा, तो रामैं कहा निहौरा।" 
(अगर कबीर काशी में शरीर त्यागकर स्वर्ग प्राप्त करता है, तो इसमें ईश्वर की कृपा का क्या एहसान है, यह तो स्थान का प्रभाव हुआ।)

हिंदी साहित्य की प्रामाणिक रचनाएँ एवं रचनाकाल


​कबीरदास स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने स्वयं यह बात स्वीकार की है:
"मसि कागद छूयौ नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ।"
(मैंने जीवन में कभी स्याही और कागज को स्पर्श नहीं किया और न ही कभी हाथ में कलम पकड़ी है।)

​चूंकि कबीर ने स्वयं कुछ नहीं लिखा, इसलिए उनके मुख से निकले उपदेशों, दोहों और पदों का संकलन उनके सबसे प्रमुख शिष्य धर्मदास ने किया।
​कबीर की समस्त प्रामाणिक हिंदी साहित्यिक रचनाओं का एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ 'बीजक' है।

• ​रचनाकाल: 'बीजक' का संकलन धर्मदास द्वारा संवत सन् 1464 ई. के आस-पास किया गया। ​'बीजक' के मुख्यतः तीन भाग हैं, जो कबीर की काव्य-विविधता और दर्शन को प्रस्तुत करते हैं:

• ​साखी : 'साखी' संस्कृत के 'साक्षी' शब्द का तद्भव रूप है। इसमें कबीर के वे दोहे संकलित हैं जो प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित हैं। इसकी भाषा मुख्य रूप से राजस्थानी और पंजाबी मिली हुई खड़ी बोली है। कबीर का संपूर्ण समाज सुधारक और नीतिपरक रूप 'साखी' में ही देखने को मिलता है।

• ​सबद : यह कबीर के गेय पदों का संकलन है। इसमें कबीर के रहस्यवादी और प्रेमपूर्ण हृदय के दर्शन होते हैं। ईश्वर के प्रति विरह, मिलन की तड़प और सूफी प्रभाव 'सबद' के पदों में स्पष्ट झलकता है। इसकी भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा और पूर्वी बोली अर्थात अवधी है।

• ​रमैनी : 'रमैनी' रामायण का अपभ्रंश है। इसमें चौपाई और दोहा छंद का प्रयोग किया गया है। रमैनी में कबीर के दार्शनिक विचार, आत्मा-परमात्मा का संबंध, जीव की उत्पत्ति और सृष्टि के रहस्य का वर्णन है। इसकी भाषा में पूर्वी हिंदी अर्थात अवधी और भोजपुरी का प्रभाव अधिक है।

भाषा शैली

​हिंदी साहित्य में कबीर की भाषा सदा से शोध और विमर्श का विषय रही है। कबीर एक घुमक्कड़ संत थे। वे जहाँ भी गए, वहाँ की लोकभाषा के शब्दों को उन्होंने अपने काव्य में पिरो लिया। इसीलिए उनकी भाषा में अवधी, ब्रज, भोजपुरी, खड़ी बोली, पंजाबी, राजस्थानी, और अरबी-फारसी के शब्द बहुतायत में मिलते हैं। कबीर ने भाषा को व्याकरण की जंजीरों में नहीं बांधा, बल्कि उसे भावों का अनुचर बनाया। भाषा पर कबीर की दृष्टि स्पष्ट थी:

"संस्कृत है कूप जल, भाखा बहता नीर।"
(संस्कृत भाषा कुएं के ठहरे हुए पानी के समान है जो एक दायरे में सीमित है, जबकि लोकभाषा बहते हुए जल के समान है जो सबको सुलभ और जीवनदायिनी है।)

​उनकी भाषा शैली के संदर्भ में हिंदी साहित्य के विद्वानों ने अलग-अलग नाम दिए हैं:
• ​सधुक्कड़ी भाषा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा है, क्योंकि इसमें साधु-संतों के बीच बोली जाने वाली मिश्रित शब्दावली थी।

• ​पंचमेल खिचड़ी: बाबू श्यामसुंदर दास ने इसे 'पंचमेल खिचड़ी' कहा है, क्योंकि इसमें पाँच-छह क्षेत्रीय भाषाओं का सहज मिश्रण था।

• ​भाषा का डिक्टेटर: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उनकी भाषा शैली पर मुग्ध होकर कहा है कि कबीर भाषा के डिक्टेटर थे। वे जिस बात को जिस रूप में कहना चाहते थे, भाषा से उसी रूप में कहलवा लेते थे— सीधे-सीधे, नहीं तो दरैरा देकर।

​कबीर की शैली मुख्य रूप से उपदेशात्मक, व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक है। जब वे समाज पर प्रहार करते हैं, तो उनकी शैली अत्यंत तीखी और व्यंग्यात्मक हो जाती है, और जब वे ईश्वर प्रेम की बात करते हैं, तो शैली अत्यंत कोमल और प्रतीकात्मक हो जाती है।

कबीर के काव्य की काव्यगत विशेषताएँ अर्थात भावपक्ष एवं कलापक्ष

​कबीर का काव्य केवल साहित्यिक आनंद के लिए नहीं रचा गया था, बल्कि यह सोए हुए समाज को जगाने का एक शंखनाद था। उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

• ​1. निर्गुण ब्रह्म की उपासना: कबीर का 'राम' दशरथ पुत्र राम नहीं, बल्कि अजन्मा, निराकार और सर्वव्यापी परब्रह्म है। उन्होंने अवतारवाद का खंडन किया और निर्गुण निराकार ईश्वर की साधना पर बल दिया। 

"दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।" 
(दशरथ के पुत्र राम की महिमा तो तीनों लोक गाते हैं, परंतु मेरे निर्गुण राम के नाम का रहस्य और स्वरूप इन सबसे बिल्कुल अलग और पारलौकिक है।)

• ​2. गुरु की महिमा का सर्वोच्च गान: हिंदी साहित्य में कबीर ने गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया है, क्योंकि गुरु के ज्ञान के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव है। 

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविंद दियो बताय॥" 
( मेरे सामने गुरु और ईश्वर दोनों खड़े हैं, मैं दुविधा में हूँ कि किसके चरण पहले स्पर्श करूँ। मैं अपने गुरु पर स्वयं को न्योछावर करता हूँ, जिन्होंने मुझे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बता दिया।)

• ​3. बाह्याडंबरों और पाखंड का कठोर विरोध: कबीर निर्भीक थे। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों और कर्मकांडों पर समान रूप से कठोर प्रहार किया। हिंदुओं की मूर्तिपूजा पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा: 
"पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजौं पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥" 
(अगर छोटे से पत्थर को पूजने से भगवान मिलते हैं, तो मैं पूरा पहाड़ ही पूजने को तैयार हूँ। इस पत्थर की मूर्ति से तो वह पत्थर की चक्की अच्छी है, जिसका पीसा हुआ अन्न खाकर संसार अपना पेट भरता है।)

​मुस्लिमों की नमाज और अजान पर व्यंग्य करते हुए कहा:

"कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥"
( कंकड़ और पत्थर जोड़कर तुमने मस्जिद खड़ी कर ली और उसके ऊपर चढ़कर मुल्ला जोर-जोर से बांग देता है। क्या तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है जो उसे चीखकर बुलाना पड़ता है?)

• ​4. रहस्यवाद : कबीर के काव्य में दो प्रकार का रहस्यवाद मिलता है— हठयोग से प्रभावित 'साधनात्मक रहस्यवाद' और सूफी दर्शन से प्रभावित 'भावात्मक रहस्यवाद'। आत्मा और परमात्मा के अद्वैत का वर्णन कबीर ने अत्यंत सुंदर दृष्टांतों से किया है: 

"जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कथ्यौ गियानी॥" 
(जिस प्रकार नदी के जल में रखे घड़े के अंदर और बाहर दोनों तरफ जल होता है, और घड़ा फूटने पर अंदर का जल बाहर के जल में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार यह शरीर घड़ा है और आत्मा जल है। शरीर नष्ट होने पर आत्मा अंततः परमात्मा में ही समा जाती है।)

• ​5. माया का स्वरूप और विरोध: कबीर ने 'माया' अर्थात सांसारिक मोह, धन, लालच को जीव और ईश्वर के बीच की सबसे बड़ी बाधा माना है। उन्होंने माया को 'ठगिनी' कहा है। 

"माया महा ठगिनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी॥" 
(मैं यह अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह माया बहुत बड़ी ठगने वाली है। यह अपने हाथों में सत्व, रज और तम रूपी तीन गुणों का फंदा लेकर घूमती है और मीठी-मीठी बातें बोलकर मनुष्य को फंसा लेती है।)

• ​6. जाति-पांति और छुआछूत का विरोध: कबीर ने तत्कालीन समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था और जातिगत भेदभाव को सिरे से नकार दिया। उन्होंने मानव मात्र की समानता का उद्घोष किया। 

"जाति पांति पूछै नहिं कोई।
हरि को भजै सो हरि का होई॥" 
( ईश्वर के दरबार में कोई किसी की जाति या धर्म नहीं पूछता। जो सच्चे मन से ईश्वर का भजन करता है, वह सीधे ईश्वर का ही प्रिय हो जाता है।)

• ​7. उलटबांसी शैली का प्रयोग: कबीर के काव्य की एक बहुत ही विशिष्ट कलात्मक विशेषता उनकी 'उलटबांसियाँ' हैं। उलटबांसी का अर्थ है— सीधी बात को उल्टे रूपक और प्रतीकों के माध्यम से कहना। इससे सामान्य अर्थ कुछ और लगता है, परंतु आध्यात्मिक अर्थ गहरा होता है। 

"एक अचंभा देखा रे भाई, ठाड़ा सिंह चरावै गाई।
पहले पूत पिछै भई माई, चेला के गुरु लागै पाई॥" 
(सामान्य रूप में— एक आश्चर्य देखा कि शेर खड़ा होकर गाय चरा रहा है, बेटे का जन्म पहले और माँ का बाद में हुआ है, और गुरु अपने चेले के पैर छू रहा है। आध्यात्मिक अर्थ— शेर अर्थात ज्ञान गाय यानी इंद्रियों को नियंत्रित कर रहा है। जीव अर्थात पुत्र की चेतना पहले जाग्रत हुई और माया अर्थात माता बाद में उसके अधीन हुई।)

हिंदी साहित्य के लेखकों व इतिहासकारों के मत

​हिंदी साहित्य के इतिहास में कबीर के मूल्यांकन को लेकर आलोचकों में लंबी बहस रही है। विभिन्न प्रतिष्ठित इतिहासकारों ने उनके विषय में निम्नलिखित प्रामाणिक मत प्रस्तुत किए हैं:

• ​आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी रसवादी आलोचक थे, इसलिए उन्होंने कबीर के काव्य में साहित्यिक रस की कमी महसूस की, लेकिन उनके समाज सुधारक रूप और निर्भीकता की भूरी-भूरी प्रशंसा की। शुक्ल जी के अनुसार: "यद्यपि वे पढ़े-लिखे नहीं थे पर उनकी प्रतिभा बड़ी प्रखर थी, जिससे उनके मुँह से बड़ी चुटीली और व्यंग्यात्मक बातें निकलती थीं। उनकी उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। कबीर ने अपनी सधुक्कड़ी भाषा में जो खुरदरी बातें कही हैं, वह समाज को जगाने के लिए अत्यंत आवश्यक थीं।"

• ​आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: आचार्य द्विवेदी ने हिंदी साहित्य में कबीर को उनका वास्तविक और सर्वोच्च स्थान दिलाया। उन्होंने कबीर को 'मस्तमौला', 'फक्कड़' और 'क्रांतिकारी' संत माना। द्विवेदी जी लिखते हैं: "हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है— गोस्वामी तुलसीदास। कबीर वाणी के डिक्टेटर थे। वे जिस बात को जिस रूप में प्रकट करना चाहते थे, उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया— बन गया है तो सीधे-सीधे, नहीं तो दरैरा देकर।"

• ​बाबू श्यामसुंदर दास: बाबू श्यामसुंदर दास ने कबीर के रहस्यवाद और उनके दार्शनिक पक्ष को अत्यंत उच्च कोटि का माना है। उनके शब्दों में: "हिंदी के रहस्यवादी कवियों में कबीर का आसन सबसे ऊँचा है। कबीर का ज्ञान न तो पोथियों का ज्ञान था और न ही कोरा बौद्धिक चिंतन। वह उनका अपना अनुभव किया हुआ ज्ञान था। उनकी पंचमेल खिचड़ी भाषा में जो आध्यात्मिक गहराई है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।"

• ​डॉ. रामकुमार वर्मा: डॉ. रामकुमार वर्मा ने कबीर के निर्गुण ब्रह्म और उनके सूफी प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। उनका मानना है कि: "कबीर का रहस्यवाद हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। उन्होंने योगियों से पारिभाषिक शब्दावली ली, सूफियों से प्रेम-तत्त्व लिया और वेदांतियों से अद्वैतवाद लिया। इन सबका सम्मिश्रण करके उन्होंने अपनी जो विचारधारा बनाई, वह पूर्णतः मौलिक और अत्यंत प्रभावशाली थी।"

• ​डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी: "कबीर का विद्रोह और उनका आक्रोश भारतीय समाज की उस पीड़ा का परिचायक है, जो सदियों से दबी हुई थी। वे केवल खंडन नहीं करते, बल्कि एक नए मानवीय समाज का मंडन भी करते हैं।"

काव्यगत शिल्प एवं रस-अलंकार विधान


​कबीर ने जानबूझकर अलंकारों या रसों का प्रयोग नहीं किया। वे तो सहज रूप से अपने भाव व्यक्त करते थे, और अलंकार उनके पीछे हाथ बांधे खड़े रहते थे।

• ​रस: कबीर के काव्य में मुख्य रूप से शांत रस की प्रधानता है, क्योंकि उनका पूरा काव्य वैराग्य, ईश्वर भक्ति और सांसारिक मोह-भंग पर आधारित है। जहाँ ईश्वर से मिलन और विरह की बात आती है, वहाँ 'विप्रलंभ शृंगार' (वियोग शृंगार) और अद्भुत रस की छटा देखने को मिलती है।

• ​अलंकार: कबीर की वाणी में रूपक, उपमा, अनुप्रास, और दृष्टांत अलंकारों का अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। उन्होंने रूपक अलंकार के माध्यम से शरीर, आत्मा और परमात्मा की सुंदर व्याख्या की है।

• ​छंद विधान: कबीर ने मुख्य रूप से 'दोहा' (साखी) और 'चौपाई' का प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त गेय पदों में उन्होंने ताल और लय का पूरा ध्यान रखा है, जिन्हें शास्त्रीय राग-रागनियों में आज भी गाया जाता है।

कबीर की साहित्यिक महत्ता

​कबीरदास केवल मध्यकाल के संत नहीं हैं, बल्कि वे आधुनिक काल के भी उतने ही प्रासंगिक विचारक हैं। उनका साहित्य इस बात का प्रमाण है कि कविता केवल महलों में बैठकर कल्पना के पंखों पर उड़ने का नाम नहीं है, बल्कि वह झोपड़ी में बैठकर समाज की सड़ी-गली व्यवस्थाओं पर हथौड़ा चलाने का भी नाम है।

​कबीर का साहित्य अंधकार में भटकते हुए समाज के लिए एक मशाल की तरह है। वे न हिंदू के सगे थे, न मुसलमान के; वे केवल सत्य के सगे थे। अपने निष्पक्ष और तटस्थ स्वभाव का परिचय देते हुए कबीर स्वयं अपने जीवन का और अपने साहित्य का दर्शन इन अंतिम पंक्तियों में स्पष्ट कर गए

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