दादू का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं शिक्षा दीक्षा भाषा शैली और काव्यगत विशेषताएँ

संत दादू दयाल: हिंदी साहित्य की निर्गुण काव्यधारा के महान साधक

​हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा का जब भी उल्लेख होता है, तो कबीरदास के बाद जो नाम सर्वाधिक श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है, वह है— संत दादू दयाल। दादू दयाल केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक, रहस्यवादी साधक और प्रेम के संदेशवाहक थे। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, धार्मिक आडंबरों और जाति-पाँति के भेदों पर प्रहार किया, किंतु उनके प्रहार में कबीर जैसी उग्रता और अक्खड़पन नहीं था; बल्कि उसमें एक शांत, सौम्य और प्रेमपूर्ण आग्रह था।

जीवन परिचय

​संत दादू दयाल का जन्म विक्रम संवत् 1601 (सन् 1544 ई.) में गुजरात के अहमदाबाद नगर में हुआ था। उनकी उत्पत्ति और जन्म को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद हैं, किंतु प्रामाणिक मान्यताओं के अनुसार, वे साबरमती नदी में बहते हुए एक लोदीराम नागर नामक ब्राह्मण को मिले थे, जिन्होंने उनका लालन-पालन किया।

​ज्ञान की खोज में दादू दयाल ने कम उम्र में ही घर त्याग दिया था। उनके गुरु का नाम वृद्धानंद माना जाता है। दादू जी ने अपने जीवन का अधिकांश समय राजस्थान में व्यतीत किया। वे सांभर, आमेर और अंततः नरायना में रहे। नरायना ही उनके संप्रदाय का मुख्य केंद्र बना, जिसे 'दादू पंथ' या 'परब्रह्म संप्रदाय' कहा जाता है। उनके 52 शिष्य थे, जिन्हें दादू पंथ के 'बावन स्तंभ' कहा जाता है, जिनमें रज्जब, सुंदरदास और प्रागदास जैसे प्रसिद्ध संत शामिल थे। विक्रम संवत् 1660 (सन् 1603 ई.) में राजस्थान के नरायना के पास स्थित भैराणा की पहाड़ी पर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

हिंदी साहित्य की प्रामाणिक रचनाएँ एवं रचनाकाल

​भक्तिकाल के अन्य निर्गुण संतों की भाँति दादू दयाल ने भी स्वयं लेखनी नहीं उठाई थी। वे जो भी उपदेश देते या गाते थे, उनके शिष्य उसे लिपिबद्ध कर लेते थे। इसीलिए उनकी रचनाओं का कोई एक निश्चित 'लेखन वर्ष' नहीं है, बल्कि उनके शिष्यों द्वारा किए गए संकलनों का प्रामाणिक रचनाकाल उपलब्ध है। उनकी संपूर्ण हिंदी साहित्यिक बानियों को मुख्य रूप से तीन प्रामाणिक ग्रंथों के रूप में मान्यता प्राप्त है:

  • हरडेबानी (रचनाकाल: 1610 - 1615 ई.): यह दादू दयाल की वाणियों का सबसे पहला संकलन है। इसका संकलन उनके दो प्रमुख शिष्यों— संतदास और जगन्नाथ दास ने किया था। दादू जी के देहावसान के कुछ वर्षों बाद ही इस ग्रंथ को संकलित किया गया था।
  • अंगवधू (रचनाकाल: 1615 - 1620 ई.): यह दादू दयाल के सबसे प्रसिद्ध शिष्य संत रज्जब द्वारा किया गया संकलन है। रज्जब ने दादू की वाणियों को विषयवार (अंगों के अनुसार) व्यवस्थित किया। साहित्यिक दृष्टि से 'अंगवधू' को बहुत अधिक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित माना जाता है।
  • दादू दयाल की बानी (रचनाकाल - 20वीं शताब्दी): आधुनिक काल में हिंदी साहित्य के प्रख्यात विद्वान परशुराम चतुर्वेदी ने दादू पंथ के विभिन्न मठों और पांडुलिपियों का गहन शोध करके 'दादू दयाल' नाम से एक अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथ संपादित किया, जिसे आज हिंदी साहित्य जगत में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

दादू दयाल की भाषा-शैली

​दादू दयाल की भाषा मुख्य रूप से 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' है, जिसमें ब्रज, राजस्थानी, गुजराती, खड़ी बोली, पंजाबी और सिंधी भाषाओं के शब्दों का सुंदर मिश्रण मिलता है। दादू चूंकि गुजरात में जन्मे और राजस्थान में रहे, इसलिए उनकी भाषा पर राजस्थानी और गुजराती का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

​कबीर की भाषा में जहाँ तीखापन और व्यंग्य का पुट अधिक है, वहीं दादू की भाषा में अपूर्व मिठास, मार्दवता और तरलता है। उनकी शैली उपदेशात्मक और मुक्तक है। उन्होंने अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से दोहा और पद शैली का प्रयोग किया है। उनकी शैली में अलंकारों का प्रयोग जानबूझकर नहीं हुआ है, बल्कि उपमा, रूपक और दृष्टांत जैसे अलंकार स्वाभाविक रूप से उनके काव्य में आ गए हैं। उनकी अभिव्यंजना शैली इतनी सरल है कि वह सीधे सामान्य जन के हृदय में उतर जाती है।

दादू के काव्य की काव्यगत विशेषताएँ

​दादू दयाल का काव्य भारतीय निर्गुण साधना और रहस्यवाद का एक जीवंत दस्तावेज है। उनके काव्य की प्रमुख काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना: दादू दयाल उस परब्रह्म के उपासक थे जिसका कोई रूप, रंग या आकार नहीं है। वे ईश्वर को सर्वव्यापी मानते थे। उनका मानना था कि ईश्वर मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि घट-घट (हृदय) में निवास करता है। 

"घीव दूध में रमि रहा, ब्यापक सब ही ठौर। 

दादू बकता बहुत है, मथ काढै ते और॥

(अर्थ: दादू जी कहते हैं कि जिस प्रकार दूध के कण-कण में घी समाया रहता है, उसी प्रकार ईश्वर सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। इस सत्य की केवल बातें करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जो अपनी सच्ची साधना रूपी मथनी से उस ईश्वर को प्राप्त कर ले, वह कोई विरला ही होता है।)
  • गुरु महिमा का अनंत गान: भक्तिकाल की परंपरा के अनुरूप दादू ने भी गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया है। उनका मानना था कि बिना सच्चे गुरु के ज्ञान के, ईश्वर की प्राप्ति संभव ही नहीं है। गुरु ही वह दीपक है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है। 

"दादू सतगुरु सहज में, कीया बहुत उपकार। 

निरंजन बाना पहिराइ कर, ले राख्या दरबार॥

(अर्थ: दादू कहते हैं कि सच्चे गुरु ने मुझ पर सहज ही बहुत बड़ा उपकार किया है। उन्होंने मुझे निर्गुण और मायारहित ईश्वर की भक्ति का वस्त्र पहनाकर, सीधे परमात्मा के दरबार में पहुँचा दिया है।)
  • प्रेम तत्त्व की प्रधानता: निर्गुण संत होने के बावजूद दादू के काव्य में सूफियों जैसा अगाध प्रेम देखने को मिलता है। वे ईश्वर को केवल निराकार ब्रह्म नहीं मानते, बल्कि उसे अपना प्रियतम मानते हैं। उनके अनुसार, शास्त्रों के कोरे ज्ञान से ईश्वर नहीं मिलता, वह केवल शुद्ध प्रेम से प्राप्त होता है। 

"दादू पाती प्रेम की, बिरला बाँचै कोइ। 

वेद पुरान पुस्तक पढ़ै, प्रेम बिना क्या होइ"

 (अर्थ: दादू कहते हैं कि परमात्मा के प्रेम की पाती (चिट्ठी) को कोई विरला व्यक्ति ही पढ़ और समझ पाता है। केवल वेद, पुराण और अन्य धार्मिक पुस्तकें पढ़ लेने से कुछ नहीं होता, यदि हृदय में सच्चा प्रेम नहीं है।)
  • आडंबरों का विरोध और सर्वधर्म समभाव: दादू ने हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों में व्याप्त कुरीतियों, मूर्ति पूजा, तीर्थाटन और बाहरी दिखावे का कड़ा विरोध किया। उन्होंने एक ऐसे पंथ की स्थापना पर बल दिया जो निष्पक्ष हो और जिसमें सभी वर्गों का समावेश हो। 

"भाई रे! ऐसा पंथ हमारा। 

द्वै पख रहित पंथ गहि पूरा, अबरन एक अधारा

(अर्थ: हे भाई! हमारा मार्ग बिल्कुल अलग और सच्चा है। यह हिंदू और मुसलमान दोनों के पक्षों और भेदों से पूरी तरह मुक्त है। हमारा मार्ग पूर्ण है और उसका एकमात्र आधार वह निराकार परमात्मा है जिसका कोई वर्ण या जाति नहीं है।)
  • रहस्यवाद और विरह की मार्मिक अनुभूति: दादू के पदों में आत्मा और परमात्मा के मिलन की तड़प बहुत गहराई से व्यक्त हुई है। उनका रहस्यवाद शुष्क नहीं है, बल्कि उसमें विरह की एक मीठी पीड़ा है। जीवात्मा परमात्मा से मिलने के लिए निरंतर तड़पती रहती है। 

"दादू यहु मन मुकर है, दरपन कहिये ताहि। 

दरसन साधू राम का, मुख देखैं सब आहि

(अर्थ: दादू समझाते हैं कि यह मनुष्य का मन एक स्वच्छ मुकर यानी दर्पण के समान है। जब यह मन रूपी दर्पण विकारों से मुक्त होकर स्वच्छ होता है, तभी इसमें राम (परमात्मा) के दर्शन होते हैं और हर कोई उसमें उस ईश्वर का मुख देख सकता है।)
  • मन की शुद्धि और आत्म-नियंत्रण: दादू का स्पष्ट मानना था कि जब तक मनुष्य अपने चंचल मन पर नियंत्रण नहीं पा लेता और विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का त्याग नहीं करता, तब तक उसे मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। 

"अपना मस्तक काटि के, बीर हुआ रन माँहि। 

दादू सूरा सोइ है, जो पीछे पाँव न देहि॥" 

(अर्थ: दादू कहते हैं कि सच्चा शूरवीर वही है जो रणभूमि में अपना सिर कटने की परवाह किए बिना डटा रहता है और कभी पीछे कदम नहीं हटाता। उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग पर वही सच्चा साधक है, जो अपना अहंकार (मस्तक) काटकर पूरी तरह परमात्मा को समर्पित हो जाता है।)

हिंदी साहित्य के इतिहासकारों के मत

​दादू दयाल के साहित्यिक और आध्यात्मिक योगदान को हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचकों और इतिहासकारों ने अत्यंत उच्च कोटि का माना है। उनके विषय में प्रमुख विद्वानों के मत इस प्रकार हैं:

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल ने दादू दयाल की भाषा और शैली की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि, "इनकी बानी कबीर की अपेक्षा अधिक सरल, सुव्यवस्थित और मधुर है। कबीर की तरह इनमें खंडन-मंडन का उग्र रूप नहीं दिखाई पड़ता। दादू की भाषा में राजस्थानी का पुट अधिक है, किंतु उसमें उबड़-खाबड़पन नहीं है।" शुक्ल जी मानते थे कि दादू ने निर्गुण मार्ग को एक बहुत ही सहज और शांत स्वरूप प्रदान किया।

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: द्विवेदी जी ने दादू की भक्ति भावना को बहुत गहराई से विश्लेषित किया है। उनका मत है कि, "दादू दयाल की कविता में जो माधुर्य और प्रेम की पीर है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने कबीर की वैचारिक क्रांति को प्रेम के रस में डुबोकर समाज के सामने प्रस्तुत किया। दादू के यहाँ क्रोध नहीं, करुणा है; चुनौती नहीं, मनुहार है।"

  • डॉ. रामकुमार वर्मा: डॉ. वर्मा ने अपने साहित्य इतिहास ग्रंथ में दादू के रहस्यवाद की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे लिखते हैं, "दादू दयाल के रहस्यवाद में जो अनुभूति की गहराई और आत्मसमर्पण का भाव है, वह उन्हें भक्तिकाल के प्रथम पंक्ति के संतों में स्थापित करता है। उनके काव्य में आत्मा की जो पुकार है, वह सीधे ईश्वर तक पहुँचने वाली है।"

  • आचार्य परशुराम चतुर्वेदी: दादू दयाल के साहित्य पर सबसे अधिक शोध करने वाले विद्वान परशुराम चतुर्वेदी का स्पष्ट मत है कि, "दादू संत साहित्य के एक ऐसे प्रकाश स्तंभ हैं, जिन्होंने अपनी सहज और सरल भाषा से भारतीय जनमानस को धर्म के आडंबरों से निकालकर शुद्ध आत्मानुभूति के मार्ग पर प्रशस्त किया। उनकी 'बानी' भारतीय अध्यात्म का सच्चा दर्पण है।"

निष्कर्ष

​संपूर्ण विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि संत दादू दयाल हिंदी साहित्य के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक समय के साथ कभी धुंधली नहीं पड़ सकती। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया कि ईश्वर को पाने के लिए न तो जंगलों में भटकने की आवश्यकता है और न ही किसी विशेष वेशभूषा की। आवश्यकता है तो बस निर्मल मन और सच्चे प्रेम की।

​"दादू नैनहुँ नीर बहै, निस दिन स्याम सनेह। 

जा कारन यहु तन धरा, सोई लागी लेह॥"

(अर्थ: दादू कहते हैं कि मेरे नेत्रों से रात-दिन अपने श्याम के प्रेम में आँसू बहते रहते हैं। जिस परमात्मा की प्राप्ति के लिए मैंने यह मनुष्य शरीर धारण किया था, अंततः उसी से मेरी सच्ची लगन लग गई है।)

​उनका संपूर्ण साहित्य सत्य, अहिंसा, प्रेम और मानवीय एकता का वह शाश्वत ग्रंथ है, जो आज के आपाधापी और वैमनस्य से भरे युग में भी पूरी मानवता को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाने में पूर्णतः सक्षम है। हिंदी साहित्य सदैव उनके इस अमूल्य साहित्यिक और आध्यात्मिक अवदान का ऋणी रहेगा।


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