चंदबरदाई का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
चंदबरदाई का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
हिंदी साहित्य के आदिकाल या वीरगाथा काल में जब तलवारों की झंकार और युद्ध के नगाड़ों की गूँज ही राष्ट्र का स्वर हुआ करती थी, तब जिस कलम ने उस शौर्य को अमर कर दिया, वह महाकवि चंदबरदाई की थी। चंदबरदाई को हिंदी साहित्य का प्रथम महाकवि और उनकी रचना पृथ्वीराज रासो को हिंदी का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव प्राप्त है। उनका साहित्य केवल कोरी कल्पना नहीं, बल्कि एक योद्धा द्वारा रणभूमि में देखे गए जीवंत सत्य का काव्यात्मक निरूपण है।
जीवन परिचय
महाकवि चंदबरदाई का जन्म अनुमानतः 1148 ईस्वी (संवत् 1205) में अविभाजित भारत के लाहौर नगर में हुआ था। वह जाति से 'भट्ट' (जगाती गोत्र) थे, जिनका मुख्य कार्य राजाओं की वंशावली और उनकी कीर्ति का गान करना होता था। उनके पिता का नाम राव वेन (या वैन) था।
चंदबरदाई दिल्ली और अजमेर के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बालसखा, घनिष्ठ मित्र, राजकवि और एक कुशल मंत्री थे। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीराज और चंदबरदाई का जन्म एक ही दिन हुआ था और उन दोनों की मृत्यु भी एक ही दिन हुई। जनश्रुति में इसके लिए एक प्रसिद्ध उक्ति है— "एक थाल जन्म, एक थाल मरण"।
चंदबरदाई केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वह एक शूरवीर योद्धा भी थे जो हर युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के साथ रणभूमि में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे। वह व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, पिंगल (छंद शास्त्र), पुराण और नाटक के प्रकांड विद्वान थे। उनकी बुद्धिमत्ता और रणनीतिक कौशल के कारण पृथ्वीराज चौहान हर महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य निर्णय में उनकी सलाह लिया करते थे।
वर्ष 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद जब मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले गया, तो अपने मित्र की रक्षा के लिए चंदबरदाई भी गजनी पहुँच गए। वहीं, शब्दभेदी बाण की प्रसिद्ध घटना के बाद, दुश्मनों के हाथों मरने से बचने के लिए दोनों मित्रों ने एक-दूसरे को कटार घोंपकर अपने प्राण त्याग दिए।
हिंदी साहित्य की रचनाएँ और प्रामाणिक रचनाकाल
हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में चंदबरदाई की एकमात्र और सर्वप्रमुख प्रामाणिक रचना एक विशाल महाकाव्य है, जिसने उन्हें साहित्य के पटल पर अमर कर दिया:
रचना का नाम: पृथ्वीराज रासो
प्रामाणिक रचनाकाल: 12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (लगभग 1186 ईस्वी से 1192 ईस्वी के मध्य)
विशेष तथ्य:
'पृथ्वीराज रासो' चंदबरदाई का जीवन भर का कार्य था, जिसे वह अपने साथ रखते थे। जब वह पृथ्वीराज चौहान की सहायता के लिए गजनी जाने लगे, तो उन्होंने इस अपूर्ण महाकाव्य को पूरा करने का दायित्व अपने योग्य पुत्र जल्हण को सौंप दिया था। स्वयं चंदबरदाई ने इस संदर्भ में लिखा है:
"पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज॥"
(अर्थात: अपनी पुस्तक अपने पुत्र जल्हण के हाथों में सौंपकर, चंदबरदाई अपने राजा के कार्य के लिए गजनी की ओर चल पड़े।)
साहित्यिक शोधों के अनुसार, रासो के वर्तमान में चार संस्करण मिलते हैं (बृहत्, मध्यम, लघु और लघुतम), जिनमें से विद्वान इसके 'लघुतम' और 'लघु' संस्करणों को चंदबरदाई द्वारा रचित मूल अंशों के सबसे निकट और प्रामाणिक मानते हैं।
भाषा शैली
चंदबरदाई की भाषा शैली आदिकालीन साहित्य की सबसे समृद्ध और विविध शैलियों में से एक है। उनकी भाषा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
डिंगल और पिंगल का अद्भुत संगम: चंदबरदाई की काव्य भाषा मुख्य रूप से 'डिंगल' और 'पिंगल' है। जब वह युद्ध के ओजस्वी दृश्यों का वर्णन करते हैं, तो उनकी भाषा डिंगल (अपभ्रंश और राजस्थानी का कठोर मिश्रित रूप) हो जाती है। वहीं, जब वह प्रेम, श्रृंगार या प्रकृति का वर्णन करते हैं, तो भाषा स्वतः ही पिंगल (अपभ्रंश और ब्रजभाषा का कोमल मिश्रित रूप) में ढल जाती है।
बहुभाषी शब्दावली: उनकी रचना में तत्सम (संस्कृत), तद्भव शब्दों के साथ-साथ अरबी, फारसी, प्राकृत और मागधी शब्दों का बहुत सहज और प्रचुर प्रयोग हुआ है। यह उस समय के उत्तर भारत के भाषाई यथार्थ को दर्शाता है।
चित्रात्मक और प्रवाहपूर्ण शैली: उनकी शैली में एक चित्रात्मकता है। जब वह सेना के प्रस्थान का वर्णन करते हैं, तो पाठक को घोड़ों की टापों और नगाड़ों की आवाजें महसूस होने लगती हैं।
ओज और माधुर्य गुण: उनके काव्य की भाषा में वीर रस के समय 'ओज गुण' (कठोर वर्णों का प्रयोग) और श्रृंगार के समय 'माधुर्य गुण' (कोमल कांत पदावली) का उत्कृष्ट निर्वाह हुआ है।
काव्यगत विशेषताएँ
महाकवि चंदबरदाई का काव्य केवल इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि साहित्य का एक जलता हुआ सूर्य है। उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
१. रस योजना (वीर और श्रृंगार का योग):
रासो काव्य की आत्मा वीर रस है। युद्धों का कारण प्रायः सुंदर राजकुमारियाँ हुआ करती थीं, इसलिए वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार रस का भी अत्यंत स्वाभाविक और हृदयग्राही वर्णन हुआ है। वीर रस में जहाँ तलवारों की खनक है, वहीं श्रृंगार रस में संयोगिता के सौंदर्य और विरह का मार्मिक चित्रण है।
२. सजीव और आँखों देखा युद्ध वर्णन:
हिंदी साहित्य में चंदबरदाई जैसा युद्ध वर्णन अत्यंत दुर्लभ है। चूँकि वह स्वयं एक सैनिक थे, इसलिए उन्होंने युद्धों का वर्णन बंद कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि रणभूमि में खून और पसीने के बीच किया है। हाथियों की चिंघाड़, तीरों की बौछार और वीरों के कटते हुए अंग— सब कुछ उनके काव्य में जीवंत हो उठता है।
"बज्जिय घोर निसान रान चौहान चहुँ दिसि।
सकल सूर सामंत समरि बल जंत्र मंत दिसि॥"
३. छंदों के सम्राट
चंदबरदाई को हिंदी साहित्य में 'छंदों का सम्राट' कहा जाता है। उन्होंने 'पृथ्वीराज रासो' में कुल 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग किया है। उनके प्रिय छंदों में छप्पय, कवित्त, दोहा, तोमर, कुंडलिया, त्रोटक और आर्या शामिल हैं। दृश्यों के अनुसार छंदों को बदलने की कला में वह पारंगत थे।
४. अलंकार योजना:
चंदबरदाई के काव्य में अलंकारों का प्रयोग थोपा हुआ नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति के साथ स्वाभाविक रूप से आया है। उन्होंने अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा का सर्वाधिक प्रयोग किया है। अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग राजा की वीरता का बखान करने में प्रचुरता से हुआ है।
५. प्रकृति एवं नख-शिख वर्णन:
कवि ने प्रकृति के आलंबन और उद्दीपन दोनों रूपों का चित्रण किया है। षड्ऋतु का वर्णन और नायिका (संयोगिता और पद्मावती) के नख-शिख सौंदर्य का वर्णन उनकी लेखनी की कोमलता को सिद्ध करता है। नायिका के सौंदर्य का एक मनोरम चित्र:
"कुटिल केस सुदेस पोह परिचिय पिक्क सद।
कमल गंध वय संध हंस गति चलत मंद मंद॥"
६. संवाद कौशल और कूटनीति:
उनके पात्रों के संवाद अत्यंत पैने, ओजस्वी और कूटनीतिक हैं। पृथ्वीराज और जयचंद के बीच, या गोरी के दूतों के साथ हुए संवादों में वाकपटुता स्पष्ट झलकती है।
जब गजनी में अंधी कर दिए जाने के बाद पृथ्वीराज चौहान को शब्दभेदी बाण चलाने का अवसर मिला, तो चंदबरदाई ने दोहे के माध्यम से ही अपने राजा को सटीक दूरी और दिशा का ज्ञान करा दिया था। यह दोहा आज भी भारत के जन-जन की जिह्वा पर है:
"चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥"
हिंदी साहित्य के मान्यता प्राप्त इतिहासकारों के मत
चंदबरदाई और उनकी रचना 'पृथ्वीराज रासो' हिंदी साहित्य में हमेशा से आकर्षण और विमर्श का केंद्र रहे हैं। साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वानों और इतिहासकारों ने उनके विषय में जो सटीक मत प्रस्तुत किए हैं, वे निम्नलिखित हैं:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल जी चंदबरदाई के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, "चंद हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका 'पृथ्वीराज रासो' हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।" यद्यपि शुक्ल जी ने ऐतिहासिक तिथियों की विसंगतियों के कारण इस ग्रंथ को 'जाली' कहा, परंतु एक कवि के रूप में उन्होंने चंदबरदाई की काव्य प्रतिभा और भाषा पर उनके अधिकार की भूरी-भूरी प्रशंसा की है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: आचार्य द्विवेदी जी ने रासो की ऐतिहासिकता को आंशिक रूप से सत्य मानते हुए इसके साहित्यिक मूल्य को सर्वोच्च बताया। चंदबरदाई के छंद-विधान पर मुग्ध होकर उन्होंने लिखा है, "छप्पय छंद चंद का अपना छंद है। जब चंद छप्पय छंद का प्रयोग करते हैं, तो उनकी लेखनी अद्भुत प्रवाह प्राप्त कर लेती है।" द्विवेदी जी ने इस ग्रंथ की रचना शैली को 'शुक-शुकी संवाद' (तोता-मैना का संवाद) के रूप में स्वीकारा है।
डॉ. रामकुमार वर्मा: वीर रस के विवेचन में डॉ. वर्मा चंदबरदाई को सर्वोच्च स्थान देते हैं। उनका मत है, "रासो में वीर रस का जैसा प्रौढ़, ओजस्वी और सजीव वर्णन है, वैसा पूरे हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। चंदबरदाई केवल कलम के ही नहीं, तलवार के भी धनी थे।"
डॉ. श्यामसुंदर दास एवं मिश्रबंधु: इन विद्वानों ने चंदबरदाई को आदिकाल का सर्वोत्कृष्ट कवि माना है। मिश्रबंधुओं ने अपने इतिहास ग्रंथ 'मिश्रबंधु विनोद' में चंदबरदाई की भाषा को पुरानी हिंदी की एक अत्यंत विकसित और सुगठित अवस्था माना है और उन्हें वीरगाथा काल का प्रतिनिधि कवि स्वीकार किया है।
डॉ. नगेन्द्र: डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, "चंदबरदाई का रासो आदिकालीन प्रवृत्तियों का एक विशाल विश्वकोश है। इसमें युद्धों और दरबारों की जो जीवंत झाँकी प्रस्तुत की गई है, वह तत्कालीन सामंती जीवन का सच्चा दर्पण है।"
निष्कर्ष
महाकवि चंदबरदाई हिंदी साहित्य के उस युग के प्रतिनिधि हैं जहाँ राष्ट्र का गौरव रणभूमि की धूल में लिखा जाता था। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल अपने स्वामी और सखा पृथ्वीराज चौहान के पराक्रम को अमर किया, बल्कि खड़ी बोली और ब्रजभाषा के पूर्वज के रूप में हिंदी साहित्य की नींव भी मजबूत की।
उनका काव्य 'पृथ्वीराज रासो' भले ही ऐतिहासिक कसौटियों पर विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा हो, परंतु उसके साहित्यिक मूल्य, रस-परिपाक, छंद-वैविध्य और भाषा के ओज को कभी नकारा नहीं जा सकता। तलवार की धार और कलम की स्याही का ऐसा अद्भुत और दुर्लभ सामंजस्य विश्व साहित्य में गिने-चुने लोगों के पास ही देखने को मिलता है। चंदबरदाई अपनी अटूट स्वामिभक्ति, मित्रता और कालजयी काव्य के लिए हिंदी साहित्य के आकाश में ध्रुव तारे के समान सदैव चमकते रहेंगे।
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