चंदबरदाई का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

चंदबरदाई का जीवन परिचय प्रमुख रचनाएं और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर  

​हिंदी साहित्य के आदिकाल या वीरगाथा काल में जब तलवारों की झंकार और युद्ध के नगाड़ों की गूँज ही राष्ट्र का स्वर हुआ करती थी, तब जिस कलम ने उस शौर्य को अमर कर दिया, वह महाकवि चंदबरदाई की थी। चंदबरदाई को हिंदी साहित्य का प्रथम महाकवि और उनकी रचना पृथ्वीराज रासो को हिंदी का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव प्राप्त है। उनका साहित्य केवल कोरी कल्पना नहीं, बल्कि एक योद्धा द्वारा रणभूमि में देखे गए जीवंत सत्य का काव्यात्मक निरूपण है।


 

 जीवन परिचय

​महाकवि चंदबरदाई का जन्म अनुमानतः 1148 ईस्वी (संवत् 1205) में अविभाजित भारत के लाहौर नगर में हुआ था। वह जाति से 'भट्ट' (जगाती गोत्र) थे, जिनका मुख्य कार्य राजाओं की वंशावली और उनकी कीर्ति का गान करना होता था। उनके पिता का नाम राव वेन (या वैन) था।

​चंदबरदाई दिल्ली और अजमेर के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बालसखा, घनिष्ठ मित्र, राजकवि और एक कुशल मंत्री थे। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीराज और चंदबरदाई का जन्म एक ही दिन हुआ था और उन दोनों की मृत्यु भी एक ही दिन हुई। जनश्रुति में इसके लिए एक प्रसिद्ध उक्ति है— "एक थाल जन्म, एक थाल मरण"

​चंदबरदाई केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वह एक शूरवीर योद्धा भी थे जो हर युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के साथ रणभूमि में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे। वह व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, पिंगल (छंद शास्त्र), पुराण और नाटक के प्रकांड विद्वान थे। उनकी बुद्धिमत्ता और रणनीतिक कौशल के कारण पृथ्वीराज चौहान हर महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य निर्णय में उनकी सलाह लिया करते थे।

 

वर्ष 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद जब मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले गया, तो अपने मित्र की रक्षा के लिए चंदबरदाई भी गजनी पहुँच गए। वहीं, शब्दभेदी बाण की प्रसिद्ध घटना के बाद, दुश्मनों के हाथों मरने से बचने के लिए दोनों मित्रों ने एक-दूसरे को कटार घोंपकर अपने प्राण त्याग दिए।


 

हिंदी साहित्य की रचनाएँ और प्रामाणिक रचनाकाल

​हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में चंदबरदाई की एकमात्र और सर्वप्रमुख प्रामाणिक रचना एक विशाल महाकाव्य है, जिसने उन्हें साहित्य के पटल पर अमर कर दिया:

रचना का नाम: पृथ्वीराज रासो

प्रामाणिक रचनाकाल: 12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (लगभग 1186 ईस्वी से 1192 ईस्वी के मध्य)

 

    विशेष तथ्य:

    'पृथ्वीराज रासो' चंदबरदाई का जीवन भर का कार्य था, जिसे वह अपने साथ रखते थे। जब वह पृथ्वीराज चौहान की सहायता के लिए गजनी जाने लगे, तो उन्होंने इस अपूर्ण महाकाव्य को पूरा करने का दायित्व अपने योग्य पुत्र जल्हण को सौंप दिया था। स्वयं चंदबरदाई ने इस संदर्भ में लिखा है:

    "पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज॥"

    (अर्थात: अपनी पुस्तक अपने पुत्र जल्हण के हाथों में सौंपकर, चंदबरदाई अपने राजा के कार्य के लिए गजनी की ओर चल पड़े।)

    ​साहित्यिक शोधों के अनुसार, रासो के वर्तमान में चार संस्करण मिलते हैं (बृहत्, मध्यम, लघु और लघुतम), जिनमें से विद्वान इसके 'लघुतम' और 'लघु' संस्करणों को चंदबरदाई द्वारा रचित मूल अंशों के सबसे निकट और प्रामाणिक मानते हैं।


     


    भाषा शैली

    ​चंदबरदाई की भाषा शैली आदिकालीन साहित्य की सबसे समृद्ध और विविध शैलियों में से एक है। उनकी भाषा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

    डिंगल और पिंगल का अद्भुत संगम: चंदबरदाई की काव्य भाषा मुख्य रूप से 'डिंगल' और 'पिंगल' है। जब वह युद्ध के ओजस्वी दृश्यों का वर्णन करते हैं, तो उनकी भाषा डिंगल (अपभ्रंश और राजस्थानी का कठोर मिश्रित रूप) हो जाती है। वहीं, जब वह प्रेम, श्रृंगार या प्रकृति का वर्णन करते हैं, तो भाषा स्वतः ही पिंगल (अपभ्रंश और ब्रजभाषा का कोमल मिश्रित रूप) में ढल जाती है।

    बहुभाषी शब्दावली: उनकी रचना में तत्सम (संस्कृत), तद्भव शब्दों के साथ-साथ अरबी, फारसी, प्राकृत और मागधी शब्दों का बहुत सहज और प्रचुर प्रयोग हुआ है। यह उस समय के उत्तर भारत के भाषाई यथार्थ को दर्शाता है।

    चित्रात्मक और प्रवाहपूर्ण शैली: उनकी शैली में एक चित्रात्मकता है। जब वह सेना के प्रस्थान का वर्णन करते हैं, तो पाठक को घोड़ों की टापों और नगाड़ों की आवाजें महसूस होने लगती हैं।

    ओज और माधुर्य गुण: उनके काव्य की भाषा में वीर रस के समय 'ओज गुण' (कठोर वर्णों का प्रयोग) और श्रृंगार के समय 'माधुर्य गुण' (कोमल कांत पदावली) का उत्कृष्ट निर्वाह हुआ है।



     

      काव्यगत विशेषताएँ

      ​महाकवि चंदबरदाई का काव्य केवल इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि साहित्य का एक जलता हुआ सूर्य है। उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

      १. रस योजना (वीर और श्रृंगार का योग):

      रासो काव्य की आत्मा वीर रस है। युद्धों का कारण प्रायः सुंदर राजकुमारियाँ हुआ करती थीं, इसलिए वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार रस का भी अत्यंत स्वाभाविक और हृदयग्राही वर्णन हुआ है। वीर रस में जहाँ तलवारों की खनक है, वहीं श्रृंगार रस में संयोगिता के सौंदर्य और विरह का मार्मिक चित्रण है।

      २. सजीव और आँखों देखा युद्ध वर्णन:

      हिंदी साहित्य में चंदबरदाई जैसा युद्ध वर्णन अत्यंत दुर्लभ है। चूँकि वह स्वयं एक सैनिक थे, इसलिए उन्होंने युद्धों का वर्णन बंद कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि रणभूमि में खून और पसीने के बीच किया है। हाथियों की चिंघाड़, तीरों की बौछार और वीरों के कटते हुए अंग— सब कुछ उनके काव्य में जीवंत हो उठता है।

      "बज्जिय घोर निसान रान चौहान चहुँ दिसि।

      सकल सूर सामंत समरि बल जंत्र मंत दिसि॥"

      ३. छंदों के सम्राट

      चंदबरदाई को हिंदी साहित्य में 'छंदों का सम्राट' कहा जाता है। उन्होंने 'पृथ्वीराज रासो' में कुल 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग किया है। उनके प्रिय छंदों में छप्पय, कवित्त, दोहा, तोमर, कुंडलिया, त्रोटक और आर्या शामिल हैं। दृश्यों के अनुसार छंदों को बदलने की कला में वह पारंगत थे।

      ४. अलंकार योजना:

      चंदबरदाई के काव्य में अलंकारों का प्रयोग थोपा हुआ नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति के साथ स्वाभाविक रूप से आया है। उन्होंने अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा का सर्वाधिक प्रयोग किया है। अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग राजा की वीरता का बखान करने में प्रचुरता से हुआ है।

      ५. प्रकृति एवं नख-शिख वर्णन:

      कवि ने प्रकृति के आलंबन और उद्दीपन दोनों रूपों का चित्रण किया है। षड्ऋतु का वर्णन और नायिका (संयोगिता और पद्मावती) के नख-शिख सौंदर्य का वर्णन उनकी लेखनी की कोमलता को सिद्ध करता है। नायिका के सौंदर्य का एक मनोरम चित्र:

      "कुटिल केस सुदेस पोह परिचिय पिक्क सद।

      कमल गंध वय संध हंस गति चलत मंद मंद॥"

      ६. संवाद कौशल और कूटनीति:

      उनके पात्रों के संवाद अत्यंत पैने, ओजस्वी और कूटनीतिक हैं। पृथ्वीराज और जयचंद के बीच, या गोरी के दूतों के साथ हुए संवादों में वाकपटुता स्पष्ट झलकती है।

      ​जब गजनी में अंधी कर दिए जाने के बाद पृथ्वीराज चौहान को शब्दभेदी बाण चलाने का अवसर मिला, तो चंदबरदाई ने दोहे के माध्यम से ही अपने राजा को सटीक दूरी और दिशा का ज्ञान करा दिया था। यह दोहा आज भी भारत के जन-जन की जिह्वा पर है:

      "चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान।

      ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥"

       

      हिंदी साहित्य के मान्यता प्राप्त इतिहासकारों के मत

      ​चंदबरदाई और उनकी रचना 'पृथ्वीराज रासो' हिंदी साहित्य में हमेशा से आकर्षण और विमर्श का केंद्र रहे हैं। साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वानों और इतिहासकारों ने उनके विषय में जो सटीक मत प्रस्तुत किए हैं, वे निम्नलिखित हैं:

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल जी चंदबरदाई के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, "चंद हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका 'पृथ्वीराज रासो' हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।" यद्यपि शुक्ल जी ने ऐतिहासिक तिथियों की विसंगतियों के कारण इस ग्रंथ को 'जाली' कहा, परंतु एक कवि के रूप में उन्होंने चंदबरदाई की काव्य प्रतिभा और भाषा पर उनके अधिकार की भूरी-भूरी प्रशंसा की है।

       

      आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: आचार्य द्विवेदी जी ने रासो की ऐतिहासिकता को आंशिक रूप से सत्य मानते हुए इसके साहित्यिक मूल्य को सर्वोच्च बताया। चंदबरदाई के छंद-विधान पर मुग्ध होकर उन्होंने लिखा है, "छप्पय छंद चंद का अपना छंद है। जब चंद छप्पय छंद का प्रयोग करते हैं, तो उनकी लेखनी अद्भुत प्रवाह प्राप्त कर लेती है।" द्विवेदी जी ने इस ग्रंथ की रचना शैली को 'शुक-शुकी संवाद' (तोता-मैना का संवाद) के रूप में स्वीकारा है।

       

      डॉ. रामकुमार वर्मा: वीर रस के विवेचन में डॉ. वर्मा चंदबरदाई को सर्वोच्च स्थान देते हैं। उनका मत है, "रासो में वीर रस का जैसा प्रौढ़, ओजस्वी और सजीव वर्णन है, वैसा पूरे हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। चंदबरदाई केवल कलम के ही नहीं, तलवार के भी धनी थे।"

       

      डॉ. श्यामसुंदर दास एवं मिश्रबंधु: इन विद्वानों ने चंदबरदाई को आदिकाल का सर्वोत्कृष्ट कवि माना है। मिश्रबंधुओं ने अपने इतिहास ग्रंथ 'मिश्रबंधु विनोद' में चंदबरदाई की भाषा को पुरानी हिंदी की एक अत्यंत विकसित और सुगठित अवस्था माना है और उन्हें वीरगाथा काल का प्रतिनिधि कवि स्वीकार किया है।

       

      डॉ. नगेन्द्र: डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, "चंदबरदाई का रासो आदिकालीन प्रवृत्तियों का एक विशाल विश्वकोश है। इसमें युद्धों और दरबारों की जो जीवंत झाँकी प्रस्तुत की गई है, वह तत्कालीन सामंती जीवन का सच्चा दर्पण है।"

        निष्कर्ष

        ​महाकवि चंदबरदाई हिंदी साहित्य के उस युग के प्रतिनिधि हैं जहाँ राष्ट्र का गौरव रणभूमि की धूल में लिखा जाता था। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल अपने स्वामी और सखा पृथ्वीराज चौहान के पराक्रम को अमर किया, बल्कि खड़ी बोली और ब्रजभाषा के पूर्वज के रूप में हिंदी साहित्य की नींव भी मजबूत की।

        ​उनका काव्य 'पृथ्वीराज रासो' भले ही ऐतिहासिक कसौटियों पर विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा हो, परंतु उसके साहित्यिक मूल्य, रस-परिपाक, छंद-वैविध्य और भाषा के ओज को कभी नकारा नहीं जा सकता। तलवार की धार और कलम की स्याही का ऐसा अद्भुत और दुर्लभ सामंजस्य विश्व साहित्य में गिने-चुने लोगों के पास ही देखने को मिलता है। चंदबरदाई अपनी अटूट स्वामिभक्ति, मित्रता और कालजयी काव्य के लिए हिंदी साहित्य के आकाश में ध्रुव तारे के समान सदैव चमकते रहेंगे।

        चंदबरदाई और उनकी प्रमुख रचनाएं - मॉक टेस्ट
        प्रश्न 1: आदिकालीन चारण कवि चंदबरदाई का जन्म कब और किस स्थान पर हुआ था?
        हिंदी साहित्य के आदिकाल के सर्वश्रेष्ठ और प्रतिनिधि चारण कवि चंदबरदाई का जन्म सन् ग्यारह सौ अड़तालीस ईसवी के लगभग लाहौर में एक भट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें हिंदी का प्रथम महाकवि और इनकी रचना को हिंदी का प्रथम महाकाव्य स्वीकार किया है। चंदबरदाई दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के अभिन्न मित्र, राजकवि, और युद्ध-अभियानों के निकटतम सहयोगी थे। साहित्य और इतिहास में यह किंवदंती अत्यधिक प्रचलित है कि राजा और कवि का जन्म और मरण एक ही दिन हुआ था। चंदबरदाई केवल एक मसिजीवी कवि ही नहीं थे, अपितु वे युद्ध-विद्या में भी अत्यंत निपुण थे और अवसर आने पर रणभूमि में तलवार भी चलाते थे। वे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, और पिंगल सहित षड्भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे तथा व्याकरण, छंदशास्त्र, ज्योतिष, और पुराणों का उन्हें अगाध ज्ञान था। यह बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें अन्य सभी दरबारी कवियों से विशिष्ट बनाता है।
        प्रश्न 2: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी कृति 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में हिंदी का प्रथम महाकवि और प्रथम महाकाव्य किसे माना है?
        आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में स्पष्ट रूप से उद्घोषित किया है कि चंदबरदाई हिंदी के प्रथम महाकवि हैं और उनकी कालजयी रचना 'पृथ्वीराज रासो' हिंदी का प्रथम महाकाव्य है। यह उपाधि उनके विपुल शब्द-भंडार, भाषाई विविधता और प्रबंध काव्य रचने की उस अभूतपूर्व क्षमता को इंगित करती है जिसने परवर्ती हिंदी साहित्य की आधारशिला रखी। उनका काव्यात्मक दृष्टिकोण इतना व्यापक और विराट था कि उसमें तात्कालिक सामंती व्यवस्था के शौर्य और विलासिता दोनों का अत्यंत सजीव चित्रण पूर्ण प्रामाणिकता के साथ उभरकर सामने आता है। उनकी मेधा में शास्त्र और शस्त्र दोनों का अद्भुत संतुलन विद्यमान था। रासो साहित्य की परंपरा में यह ग्रंथ अपने विशाल आकार, सर्ग-विभाजन और रस-परिपाक के कारण प्रथम महाकाव्य की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरा उतरता है।
        प्रश्न 3: गजनी प्रस्थान के समय चंदबरदाई ने अपने अधूरे महाकाव्य 'पृथ्वीराज रासो' को पूर्ण करने का दायित्व किसे सौंपा था?
        गजनी प्रस्थान का प्रसंग चंदबरदाई के जीवन का सबसे मार्मिक और चरमोत्कर्ष का क्षण है। जब शहाबुद्दीन गौरी धोखे से पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर ले गया, तो एक सच्चे मित्र की भांति चंदबरदाई ने भी अपने प्राणों की चिंता किए बिना गजनी की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने अपने जीवन के सबसे महान कार्य 'पृथ्वीराज रासो' को अधूरा ही छोड़ दिया और उसे अपने पुत्र जल्हण को सौंप दिया। साहित्य में इसे "पुस्तक जल्हण हथ्थ दै, चलि गज्जन नृपकाज" पंक्ति द्वारा स्मरण किया जाता है। यह ऐतिहासिक घटना भारतीय साहित्य में गुरु-शिष्य और पिता-पुत्र परंपरा के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम और अडिग स्वामिभक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है। जल्हण ने ही बाद में अपने पिता की इस महान कृति को पूर्णता प्रदान की।
        प्रश्न 4: "चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान..." उक्ति का प्रयोग चंदबरदाई ने किस संदर्भ में किया था?
        गजनी दरबार में चंदबरदाई द्वारा प्रदर्शित चातुर्य उनकी बहुमुखी प्रतिभा का चरमोत्कर्ष है। जब पृथ्वीराज चौहान को अंधा कर दिया गया था, तब एक अंधे राजा को शब्दभेदी बाण चलाने के लिए प्रेरित करना और काव्यात्मक रूपक "चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान" के माध्यम से लक्ष्य (शहाबुद्दीन गौरी) की सटीक भौगोलिक स्थिति समझाना, यह सिद्ध करता है कि वे गणित, दिशा-विज्ञान और मनोविज्ञान के कितने बड़े ज्ञाता थे। यह मात्र एक कविता नहीं थी, बल्कि एक अचूक मारक अस्त्र था जिसने इतिहास की धारा को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इसी सटीक मार्गदर्शन से पृथ्वीराज ने गौरी का वध किया और इसके उपरांत दोनों मित्रों ने एक-दूसरे का वध करके अपने प्राण त्याग दिए।
        प्रश्न 5: 'पृथ्वीराज रासो' में प्रयुक्त भाषा-शैली क्या है, जिसने शृंगार और वीर रस के मध्य एक अद्भुत सेतु निर्मित किया?
        भाषा और शिल्प के स्तर पर चंदबरदाई का अधिकार विस्मयकारी था। वे षड्भाषा (संस्कृत, प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पिशाची और अपभ्रंश) के मर्मज्ञ ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी रचना के लिए पिंगल शैली (अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा) का चयन किया, जो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। डिंगल की कर्कशता के विपरीत पिंगल की मधुरता ने उनके काव्य में शृंगार और वीर रस के मध्य एक ऐसा सेतु निर्मित किया, जो श्रोताओं के हृदय में सीधे उतर जाता था। इस भाषाई संरचना में राजस्थानी, ब्रजभाषा, और अरबी-फारसी के शब्दों का भी अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। यह सिद्ध करता है कि बारहवीं शताब्दी का उत्तर भारत किस प्रकार एक बड़े सांस्कृतिक और भाषाई संक्रमण के दौर से गुजर रहा था।
        प्रश्न 6: 'पृथ्वीराज रासो' के सबसे बड़े संस्करण (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी) में सर्गों (समय) और छंदों की कुल संख्या कितनी है?
        'पृथ्वीराज रासो' के मूल पाठ को लेकर साहित्य जगत में अत्यंत गहरा विवाद रहा है, जिसके परिणामस्वरूप इसके चार संस्करण प्राप्त होते हैं। सबसे बड़ा संस्करण नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित हुआ है, जिसमें लगभग सोलह हजार तीन सौ छह छन्द और उनहत्तर समय (सर्ग) हैं। इस विशाल महाकाव्य में सर्गों को 'समय' की संज्ञा दी गई है। छंदों की यह तीव्र गतिशीलता और विशाल संख्या कवि के पिंगल शास्त्र और प्रबंध काव्य रचने की असाधारण क्षमता को पूर्णतः प्रमाणित करती है। इसी वृहद संस्करण के आधार पर इसकी ऐतिहासिकता और अप्रामाणिकता के कई विवाद भी खड़े हुए हैं।
        प्रश्न 7: 'पृथ्वीराज रासो' में कुल कितने प्रकार के विभिन्न छंदों का प्रयोग किया गया है, जिसके कारण इसे 'छंदों का अजायबघर' कहा जाता है?
        'पृथ्वीराज रासो' आदिकालीन रासो साहित्य का सबसे वृहद, प्रदीर्घ और विवादास्पद प्रबंध काव्य है, जिसे विद्वानों ने इसकी अभूतपूर्व छंदात्मक विविधता के कारण 'छंदों का अजायबघर' कहकर भी पुकारा है। इसमें अड़सठ (68) प्रकार के विभिन्न छंदों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया है, जिनमें कवित्त, छप्पय, दूहा, तोमर, त्रोटक, गाह और आर्या प्रमुख हैं। छंदों की यह तीव्र गतिशीलता और विविधता कवि के पिंगल शास्त्र और व्याकरण पर असाधारण और अचूक अधिकार को पूर्णतः प्रमाणित करती है। चंदबरदाई दृश्य और रस के अनुकूल तत्काल छंद परिवर्तित करने में अद्वितीय थे, जो उनके नाद-सौंदर्य की सर्वोच्च अवस्था है।
        प्रश्न 8: सन् 1875 में किस विद्वान ने 'पृथ्वीराज विजय' महाकाव्य की खंडित प्रति के आधार पर 'पृथ्वीराज रासो' को पूर्णतः जाली ग्रंथ घोषित किया था?
        रासो की प्रामाणिकता का विवाद हिंदी साहित्य के इतिहास के सबसे जटिल और चर्चित विमर्शों में से एक है। इस विवाद का सूत्रपात सन् अट्ठारह सौ पचहत्तर (1875) में डॉक्टर वूलर द्वारा हुआ, जब उन्हें कश्मीरी कवि जयानक कृत "पृथ्वीराज विजय" नामक संस्कृत महाकाव्य की खंडित प्रति प्राप्त हुई। उसमें वर्णित ऐतिहासिक तिथियों और रासो की तिथियों में भारी अंतर देखकर उन्होंने इसे पूर्णतः जाली ग्रंथ घोषित कर दिया। उनके इस कदम के पश्चात आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, मुंशी देवीप्रसाद और कविराज श्यामलदास जैसे उद्भट विद्वानों ने भी ऐतिहासिक विसंगतियों और अरबी-फारसी शब्दों की अधिकता के कारण इसे पूर्णतः अप्रामाणिक मान लिया।
        प्रश्न 9: 'पृथ्वीराज रासो' की ऐतिहासिक तिथियों की विसंगति को सुलझाने हेतु 'आनंद संवत्' की नवीन और तार्किक परिकल्पना किस विद्वान ने प्रस्तुत की?
        रासो की प्रामाणिकता के समर्थकों का भी एक बहुत दृढ़ और तार्किक वर्ग रहा है। मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने रासो की तिथियों और ऐतिहासिक तिथियों के बीच के नब्बे से निन्यानवे वर्षों के अंतर को पाटने के लिए 'आनंद संवत्' की अत्यंत नवीन और तार्किक परिकल्पना प्रस्तुत की। उनके अनुसार चंदबरदाई ने विक्रम संवत में से नब्बे वर्ष घटाकर एक नए आनंद संवत (शून्य संवत) का प्रवर्तन किया था। इस आनंद संवत के आधार पर गणना करने पर रासो में उल्लिखित सभी ऐतिहासिक घटनाक्रम और तिथियां पूर्ण रूप से सटीक और प्रामाणिक सिद्ध हो जाती हैं। प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए यह सबसे बड़ा तर्क माना जाता है।
        प्रश्न 10: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार 'पृथ्वीराज रासो' का मूल रूप किस शैली या संवाद में रचा गया था?
        प्रामाणिक और अप्रामाणिक के इस चरम विवाद के मध्य आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, सुनीति कुमार चटर्जी और मुनि जिनविजय जैसे विचारकों ने अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर इसे 'अर्ध-प्रामाणिक' ग्रंथ माना। आचार्य द्विवेदी जी का स्पष्ट मत है कि रासो का मूल रूप वही है जो 'शुक-शुकी संवाद' के रूप में रचा गया था। जिन प्रसंगों में यह संवाद नहीं है, उन्हें बाद में जोड़ा गया प्रक्षिप्त अंश समझना चाहिए। सदियों तक मौखिक और लिखित परंपरा में रहने के कारण चारणों ने इसमें बहुत से नए अंश जोड़ दिए, जिससे इसका स्वरूप विकृत हो गया, परंतु शुक-शुकी संवाद वाले अंश पूर्णतः चंदबरदाई रचित और प्रामाणिक हैं।
        प्रश्न 11: 'पृथ्वीराज रासो' में किन दो रसों का मणिकांचन संयोग (समन्वय) हिंदी साहित्य में अद्वितीय माना जाता है?
        साहित्यिक और काव्यात्मक मूल्यांकन की दृष्टि से रासो एक अत्यंत उच्च कोटि का महाकाव्य सिद्ध होता है। इसमें वीर और शृंगार रस का जो मणिकांचन संयोग हुआ है, वह हिंदी साहित्य में सर्वथा अद्वितीय है। युद्धों के सजीव और लोमहर्षक वर्णन में जहाँ वीर रस अपने पूर्ण उत्कर्ष और रौद्र रूप पर पहुंच जाता है, वहीं रानियों के रूप-सौंदर्य, नख-शिख वर्णन और मिलन की आकुलता में शृंगार रस की अत्यंत मधुर और सूक्ष्म छटा देखने को मिलती है। आचार्य शुक्ल ने भी स्वीकार किया है कि रासो में वीर रस अंगी (प्रधान) है और शृंगार रस उसका अंग (सहायक) बनकर उभरा है, जो तत्कालीन सामंती मानसिकता को सटीक रूप से उद्घाटित करता है।
        प्रश्न 12: पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई के संबंधों के बारे में कौन सी ऐतिहासिक किंवदंती सर्वाधिक प्रचलित है?
        पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई के मध्य का संबंध केवल आश्रयदाता और आश्रित का नहीं था, अपितु यह दो शरीरों और एक आत्मा का संबंध था। साहित्यिक और ऐतिहासिक किंवदंतियों के अनुसार उनका जन्म एक ही दिन हुआ था और यह भी माना जाता है कि गजनी में दोनों का मरण भी एक ही दिन हुआ। यह धारणा उनके मध्य विद्यमान उस गहरे मनोवैज्ञानिक, आत्मिक और भावनात्मक जुड़ाव को रेखांकित करती है, जो तत्कालीन सामंती समाज में दुर्लभ था। चंदबरदाई अपने राजा के अंतरंग सखा थे जो संकट के क्षणों में उन्हें उचित परामर्श देने से कभी पीछे नहीं हटते थे।
        प्रश्न 13: विद्वानों के एक बड़े वर्ग द्वारा 'पृथ्वीराज रासो' के किस संस्करण को चंदबरदाई की मूल और वास्तविक रचना माना जाता है?
        रासो के मूल पाठ को लेकर गहरे विवाद के कारण इसके चार संस्करण प्राप्त होते हैं। सबसे बड़ा संस्करण काशी से प्रकाशित है। द्वितीय मध्यम आकार का है। तृतीय लघु आकार का है। जबकि चतुर्थ संस्करण लघुतम है जिसमें केवल तेरह सौ छंद हैं। विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इसी लघुतम संस्करण (तेरह सौ छंदों वाले) को चंदबरदाई की मूल और वास्तविक रचना मानने के पक्ष में अपना मत प्रस्तुत करता है। उनका तर्क है कि इसमें प्रक्षिप्त (बाद में जोड़े गए) अंशों की संभावना न्यूनतम है और यही वह मूल काव्यात्मक रूप है जिसे चंदबरदाई ने स्वयं रचा था।
        प्रश्न 14: 'पद्मावती समय' और 'शशिव्रता समय' में कथानक-रूढ़ियों के अंतर्गत किस माध्यम से नायक-नायिका के मध्य प्रेम का अंकुरण और संदेश प्रेषण दिखाया गया है?
        कथानक-रूढ़ियों का अत्यंत कलात्मक और बहुल प्रयोग इस महाकाव्य की एक अन्य प्रमुख विशेषता है। मध्यकालीन भारतीय साहित्य में अनेक रूढ़ियां प्रचलित थीं। चंदबरदाई ने इन सभी कथानक-रूढ़ियों का अत्यंत स्वाभाविक प्रयोग किया है। 'पद्मावती समय' और 'शशिव्रता समय' में विशेष रूप से पक्षियों (शुक-सारिका) के माध्यम से नायक-नायिका के मध्य प्रेम का अंकुरण और संदेशों का आदान-प्रदान दर्शाया गया है। यह प्रयोग इस महाकाव्य को नीरस ऐतिहासिक ग्रंथ बनने से बचाता है और इसमें साहित्यिक रोचकता और रहस्यवाद का संचार करता है।
        प्रश्न 15: रासो का वह कौन सा मार्मिक प्रसंग है जो पृथ्वीराज के चरित्र की जटिलता, उनके न्याय-विधान और मानवीय कमजोरियों को अत्यंत गहराई से उद्घाटित करता है?
        महाकाव्य के सबसे मार्मिक और शक्तिशाली प्रसंगों में 'कैमास वध' का विशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए। कैमास वध का प्रसंग पृथ्वीराज के चरित्र की जटिलता, उनके न्याय-विधान और मानवीय कमजोरियों को अत्यंत गहराई से उद्घाटित करता है। अपने ही विश्वस्त और योग्य मंत्री कैमास के अपराध पर उसे मृत्युदंड देना, राजा के अंतर्द्वंद्व और तत्कालीन सामंती न्याय व्यवस्था की कठोरता को दर्शाता है। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि चंदबरदाई केवल एक चारण और प्रशस्तिकार नहीं थे, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के अत्यंत सूक्ष्म पारखी और महान मनोवैज्ञानिक भी थे।

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