अमीर खुसरो का जीवन परिचय भाषा शैली और प्रमुख रचनाएं और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
अमीर खुसरो का जीवन परिचय भाषा शैली और प्रमुख रचनाए
अमीर खुसरो
जब भी हम हिंदी भाषा, खास तौर पर हमारी 'खड़ी बोली' की बात करते हैं, तो सबसे पहला नाम जो हमारे दिमाग में आता है, वह है— अमीर खुसरो।
अमीर खुसरो का जीवन परिचय
अमीर खुसरो का जन्म सन् 1253 ईस्वी (संवत 1310) में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम 'अबुल हसन यमीनुद्दीन' था। उनके पिता का नाम सैफुद्दीन था, जो तुर्की से भारत आकर बस गए थे। खुसरो की माँ एक भारतीय राजपूत महिला थीं। यही वजह है कि खुसरो के अंदर तुर्की का जोश और भारत की मिठास, दोनों का गजब का संगम देखने को मिलता है।
बचपन में ही उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया था, जिसके बाद उनकी परवरिश उनके नाना ने की। खुसरो बचपन से ही बहुत तेज़ दिमाग वाले थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के 11 अलग-अलग सुल्तानों का शासन देखा था, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है। वह राजदरबार में रहते ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल हमेशा आम जनता और सूफी संतों के बीच बसता था।
अमीर खुसरो, महान सूफी संत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के बहुत बड़े भक्त और शिष्य थे। वह अपने गुरु से इतना प्यार करते थे कि जब उन्हें अपने गुरु के निधन की खबर मिली, तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाए। अपने गुरु की मजार पर जाकर उन्होंने जो पंक्तियां कहीं, वह आज भी लोगों की आंखों में आंसू ला देती हैं:
"गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस। चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस॥"
अर्थात: मेरी गोरी अर्थात गुरु आज सेज पर सो रही है और उसने अपने चेहरे पर बाल डाल लिए हैं। ऐ खुसरो, अब तू भी अपने घर अर्थात परलोक चल, क्योंकि अब चारों तरफ अंधेरा हो गया है।
इसी घटना के कुछ ही महीनों बाद, सन् 1325 ईस्वी (संवत 1382) में अमीर खुसरो ने भी अपने प्राण त्याग दिए। उनकी कब्र भी दिल्ली में उनके गुरु निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के ठीक पास ही बनाई गई।
अमीर खुसरो की रचनाएं व रचनाकाल
अमीर खुसरो ने हिंदी जिसे वह 'हिंदवी' कहते थे, में इतना बेहतरीन साहित्य रचा है जो आज भी हमारे लोक जीवन में ज़िंदा है।
चूंकि अमीर खुसरो की हिंदी रचनाएं दरबारी साहित्य न होकर 'लोक साहित्य' थीं, इसलिए इनके लिखे जाने की कोई एक निश्चित तारीख या साल बता पाना मुश्किल है। फिर भी, हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने खुसरो के जीवनकाल (1253-1325 ई.) के आधार पर इनकी रचनाओं का प्रामाणिक समय लगभग 13वीं सदी का अंत और 14वीं सदी की शुरुआत (1280 ई. से 1325 ई. के बीच) माना है।
नीचे खुसरो की सभी प्रमुख हिंदी रचनाओं के नाम और उनका विवरण दिया गया है:
- खालिक बारी (रचनाकाल: लगभग 1315-1320 ई.): यह खुसरो की बहुत ही अनोखी रचना है। असल में यह एक शब्दकोश है जिसे कविता के रूप में लिखा गया है। इसमें अरबी, फारसी और हिंदी (हिंदवी) के शब्दों को एक साथ मिलाकर तुकबंदी की गई है ताकि बच्चों और आम लोगों को दूसरी भाषा के शब्द आसानी से याद हो जाएं। यह उनकी सबसे प्रामाणिक हिंदी पुस्तक मानी जाती है।
- पहेलियाँ (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): खुसरो अपनी पहेलियों के लिए सबसे ज्यादा मशहूर हैं। उन्होंने आम लोगों के मनोरंजन और दिमागी कसरत के लिए ऐसी पहेलियां लिखीं जो आज तक गांवों और शहरों में पूछी जाती हैं। खुसरो की पहेलियां दो तरह की होती हैं:
- अंतर्लापिका: जिसके अंदर ही उसका जवाब छिपा होता है।
- बहिर्लापिका: जिसका जवाब पहेली के बाहर से खोजना पड़ता है।
- मुकरियाँ या कह-मुकरियाँ (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): यह खुसरो का अपना खोजा हुआ एक मजेदार काव्य रूप है। इसमें चार लाइनें होती हैं। शुरू की तीन लाइनों में ऐसा लगता है कि सखी अपने प्रेमी के बारे में बात कर रही है, लेकिन चौथी लाइन में वह अपनी बात से 'मुकर' जाती है और जवाब कुछ और ही निकलता है।
"रात समय वह मेरे आवे, भोर भये वह घर उठि जावे।
यह अचरज है सबसे न्यारा, ऐ सखि साजन? ना सखि तारा।"
- दो सखुने (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): यह भी खुसरो की गजब की दिमागी कलाकारी है। इसमें दो अलग-अलग सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन दोनों का जवाब एक ही होता है। फारसी और हिंदी के शब्दों का ऐसा खेल खुसरो के अलावा कोई नहीं खेल सकता था।
- दो सखुने (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): यह भी खुसरो की गजब की दिमागी कलाकारी है। इसमें दो अलग-अलग सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन दोनों का जवाब एक ही होता है। फारसी और हिंदी के शब्दों का ऐसा खेल खुसरो के अलावा कोई नहीं खेल सकता था।
गोश्त (मांस) क्यों न खाया? डोम (गायक) क्यों न गाया?
उत्तर- "गला न था।")- निस्बतें (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): निस्बत का मतलब होता है संबंध या समानता। इसमें दो बिल्कुल अलग-अलग चीजों के बीच कोई एक समानता खोजी जाती है।
उदाहरण: प्रश्न- चूल्हे और चक्की में क्या समानता है? उत्तर- "दोनों पाटों के बीच पीसते या जलते हैं।"
- ढकोसले (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): ढकोसले का मतलब है ऐसी बेतुकी बातें जिनका कोई सीधा अर्थ न निकले, लेकिन सुनने में बहुत मजा आए। यह पूरी तरह से लोक मनोरंजन के लिए लिखे गए थे।
उदाहरण: "खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाय। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय।"- ग़ज़लें और गीत (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): खुसरो ने हिंदी और फारसी को मिलाकर बहुत ही खूबसूरत ग़ज़लें और गीत रचे। वसंत ऋतु के गीत, सावन के गीत और विदाई के गीत।
- निस्बतें (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): निस्बत का मतलब होता है संबंध या समानता। इसमें दो बिल्कुल अलग-अलग चीजों के बीच कोई एक समानता खोजी जाती है।
- ढकोसले (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): ढकोसले का मतलब है ऐसी बेतुकी बातें जिनका कोई सीधा अर्थ न निकले, लेकिन सुनने में बहुत मजा आए। यह पूरी तरह से लोक मनोरंजन के लिए लिखे गए थे।
- ग़ज़लें और गीत (रचनाकाल: 1280 ई. से 1325 ई.): खुसरो ने हिंदी और फारसी को मिलाकर बहुत ही खूबसूरत ग़ज़लें और गीत रचे। वसंत ऋतु के गीत, सावन के गीत और विदाई के गीत।
जैसे- 'काहे को ब्याही बिदेस'
अमीर खुसरो की भाषा शैली: 'हिंदवी'
अमीर खुसरो की भाषा को समझना हिंदी साहित्य की जड़ को समझने जैसा है। खुसरो से पहले राजदरबारों में सिर्फ फारसी या अरबी का बोलबाला था। आम जनता जो भाषा बोलती थी, उसे राजदरबार में अनपढ़ों की भाषा माना जाता था। लेकिन खुसरो ने पहली बार आम जनता की भाषा यानी 'खड़ी बोली' को साहित्य का रूप दिया। खुसरो ने अपनी इस भाषा को 'हिंदवी' नाम दिया था।
उनको अपनी इस देसी भाषा पर बहुत गर्व था। उन्होंने बड़ी शान से कहा था:
"चूँ मन तूतिय-ए-हिंदम अर रास्त पुर्सी, ज़े मन हिंदवी पुर्स ता नग्ज़ गोयम।"
(अर्थात: अगर तुम सचमुच मुझसे बात करना चाहते हो, तो मैं हिंदुस्तान की तूती (तोता) हूँ, मुझसे हिंदवी (हिंदी) में बात करो ताकि मैं तुम्हें मीठी बातें बता सकूं।)
खुसरो की भाषा शैली की मुख्य बातें:
- खड़ी बोली का शुरुआती रूप: हम आज जो हिंदी बोलते हैं, उसकी नींव खुसरो ने ही रखी थी। उनकी पहेलियों और मुकरियों में बिल्कुल साफ और आज के जैसी खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
- ब्रज और अवधी का मिश्रण: खुसरो के गीतों (खासकर सावन और विदाई के गीतों) में ब्रज भाषा और अवधी की गजब की मिठास देखने को मिलती है।
- फारसी और हिंदी का गंगा-जमुनी संगम: खुसरो ने फारसी और हिंदी को ऐसे मिलाया जैसे दूध में चीनी। उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल है जिसमें एक लाइन फारसी की है और दूसरी हिंदी की:
"जे हाल मिसकीं मकुन तगाफ़ुल, दुराय नैना बनाये बतियाँ। कि ताब-ए-हिज्रां न दारम ऐ जां, न लेहु काहे लगाये छतियां॥"
(अर्थात: मुझ गरीब की हालत को नजरअंदाज मत करो, आंखें चुराकर बातें मत बनाओ। मुझसे अब जुदाई बर्दाश्त नहीं होती, तुम मुझे अपने गले से क्यों नहीं लगा लेते।)
- सरल और बोलचाल की शैली: खुसरो ने जानबूझकर मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उनकी शैली बिल्कुल वैसी थी जैसी गांवों की चौपालों पर बैठकर लोग आपस में बात करते हैं।
अमीर खुसरो की भाषा को समझना हिंदी साहित्य की जड़ को समझने जैसा है। खुसरो से पहले राजदरबारों में सिर्फ फारसी या अरबी का बोलबाला था। आम जनता जो भाषा बोलती थी, उसे राजदरबार में अनपढ़ों की भाषा माना जाता था। लेकिन खुसरो ने पहली बार आम जनता की भाषा यानी 'खड़ी बोली' को साहित्य का रूप दिया। खुसरो ने अपनी इस भाषा को 'हिंदवी' नाम दिया था।
उनको अपनी इस देसी भाषा पर बहुत गर्व था। उन्होंने बड़ी शान से कहा था:
"चूँ मन तूतिय-ए-हिंदम अर रास्त पुर्सी, ज़े मन हिंदवी पुर्स ता नग्ज़ गोयम।"
(अर्थात: अगर तुम सचमुच मुझसे बात करना चाहते हो, तो मैं हिंदुस्तान की तूती (तोता) हूँ, मुझसे हिंदवी (हिंदी) में बात करो ताकि मैं तुम्हें मीठी बातें बता सकूं।)
खुसरो की भाषा शैली की मुख्य बातें:
- खड़ी बोली का शुरुआती रूप: हम आज जो हिंदी बोलते हैं, उसकी नींव खुसरो ने ही रखी थी। उनकी पहेलियों और मुकरियों में बिल्कुल साफ और आज के जैसी खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
- ब्रज और अवधी का मिश्रण: खुसरो के गीतों (खासकर सावन और विदाई के गीतों) में ब्रज भाषा और अवधी की गजब की मिठास देखने को मिलती है।
- फारसी और हिंदी का गंगा-जमुनी संगम: खुसरो ने फारसी और हिंदी को ऐसे मिलाया जैसे दूध में चीनी। उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल है जिसमें एक लाइन फारसी की है और दूसरी हिंदी की:
- सरल और बोलचाल की शैली: खुसरो ने जानबूझकर मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। उनकी शैली बिल्कुल वैसी थी जैसी गांवों की चौपालों पर बैठकर लोग आपस में बात करते हैं।
अमीर खुसरो के काव्य की काव्यगत विशेषताएँ: हंसी, रहस्य और प्रेम का खजाना
अमीर खुसरो की कविताएं सिर्फ टाइमपास नहीं हैं, बल्कि उनमें उस समय के समाज और इंसान के दिल की गहरी बातें छिपी हैं।
- 1. मनोरंजन और बौद्धिक कसरत : खुसरो की कविताओं की सबसे बड़ी खूबी उनका मनोरंजन है। पहेलियां और मुकरियां सिर्फ हंसाती नहीं हैं, बल्कि दिमाग को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उन्होंने कविता को दरबारों के भारी-भरकम माहौल से निकालकर चौपाल की हंसी-ठिठोली का हिस्सा बना दिया।
- 2. लोक-जीवन और संस्कृति का सजीव चित्रण: खुसरो ने अपनी कविताओं में आम भारतीय ज़िंदगी को पिरोया है। चरखा, कुत्ता, ढोल, पान, चूल्हा, चक्की, सावन के झूले, मायका छोड़ती हुई बेटी का दर्द — ये सब उनकी कविताओं में झलकते हैं। उनका गीत "काहे को ब्याही बिदेस रे, सुन बाबुल मोरे..." आज भी बेटियों की विदाई पर सुनकर लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
- 3. सांप्रदायिक सौहार्द: खुसरो एक पक्के मुसलमान थे, लेकिन उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिंदू परंपराओं को पूरे दिल से अपनाया। उनके साहित्य में होली, दिवाली, और वसंत पंचमी का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। वे सही मायनों में भारत की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' अर्थात मिली-जुली संस्कृति के पहले सबसे बड़े प्रतीक हैं।
- 4. रहस्यवाद और सूफी प्रेम: खुसरो की कविताओं में कई जगह ईश्वर के प्रति उनका गहरा सूफी प्रेम झलकता है। सूफी विचारधारा में ईश्वर को प्रेमी या प्रेमिका माना जाता है। उनके साहित्य में 'प्रेम' ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने लिखा है:
"खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार॥"
(अर्थात: प्रेम की नदी की धारा उल्टी होती है। जो इसमें तैर कर पार होने की कोशिश करता है, वो डूब जाता है, और जो इसमें पूरी तरह डूब जाता है, वही भवसागर पार कर लेता है।)
- 5. प्रकृति चित्रण: आम, कोयल, बारिश, बसंत के फूल— इन सबका बहुत ही सुंदर और रसीला वर्णन खुसरो की कविताओं में मिलता है। जब वह बसंत ऋतु का वर्णन करते हैं, तो पढ़ने वाले को लगता है जैसे उसके आस-पास सरसों के फूल खिल गए हों।
अमीर खुसरो की कविताएं सिर्फ टाइमपास नहीं हैं, बल्कि उनमें उस समय के समाज और इंसान के दिल की गहरी बातें छिपी हैं।
- 1. मनोरंजन और बौद्धिक कसरत : खुसरो की कविताओं की सबसे बड़ी खूबी उनका मनोरंजन है। पहेलियां और मुकरियां सिर्फ हंसाती नहीं हैं, बल्कि दिमाग को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उन्होंने कविता को दरबारों के भारी-भरकम माहौल से निकालकर चौपाल की हंसी-ठिठोली का हिस्सा बना दिया।
- 2. लोक-जीवन और संस्कृति का सजीव चित्रण: खुसरो ने अपनी कविताओं में आम भारतीय ज़िंदगी को पिरोया है। चरखा, कुत्ता, ढोल, पान, चूल्हा, चक्की, सावन के झूले, मायका छोड़ती हुई बेटी का दर्द — ये सब उनकी कविताओं में झलकते हैं। उनका गीत "काहे को ब्याही बिदेस रे, सुन बाबुल मोरे..." आज भी बेटियों की विदाई पर सुनकर लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
- 3. सांप्रदायिक सौहार्द: खुसरो एक पक्के मुसलमान थे, लेकिन उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिंदू परंपराओं को पूरे दिल से अपनाया। उनके साहित्य में होली, दिवाली, और वसंत पंचमी का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। वे सही मायनों में भारत की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' अर्थात मिली-जुली संस्कृति के पहले सबसे बड़े प्रतीक हैं।
- 4. रहस्यवाद और सूफी प्रेम: खुसरो की कविताओं में कई जगह ईश्वर के प्रति उनका गहरा सूफी प्रेम झलकता है। सूफी विचारधारा में ईश्वर को प्रेमी या प्रेमिका माना जाता है। उनके साहित्य में 'प्रेम' ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने लिखा है:
- 5. प्रकृति चित्रण: आम, कोयल, बारिश, बसंत के फूल— इन सबका बहुत ही सुंदर और रसीला वर्णन खुसरो की कविताओं में मिलता है। जब वह बसंत ऋतु का वर्णन करते हैं, तो पढ़ने वाले को लगता है जैसे उसके आस-पास सरसों के फूल खिल गए हों।
अमीर खुसरो के बारे में हिंदी साहित्य इतिहास के लेखकों के मत
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले बड़े-बड़े विद्वानों और आलोचकों ने अमीर खुसरो को बहुत ही सम्मान की नजर से देखा है। आइए जानते हैं कि साहित्य के दिग्गजों ने खुसरो के बारे में क्या कहा है:
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत: हिंदी साहित्य के सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में अमीर खुसरो की तारीफ करते हुए लिखा है— "खुसरो की पहेलियां और मुकरियां बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें उक्ति-वैचित्र्य की प्रधानता थी। यद्यपि कुछ रसीले गीत और दोहे भी इन्होंने कहे हैं, पर इनकी प्रसिद्धि उसी उक्ति-वैचित्र्य के कारण है। जिस समय विद्यापति पदावली में श्रृंगार की लहरें उठा रहे थे, उस समय खुसरो ठेठ खड़ी बोली में पहेलियां बुझा रहे थे।" शुक्ल जी मानते थे कि खुसरो का मुख्य उद्देश्य आम जनता का मनोरंजन करना था, और इस काम में वो पूरी तरह सफल रहे।
- डॉ. रामकुमार वर्मा का मत: डॉ. वर्मा ने खुसरो के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है— "अमीर खुसरो ही हिंदी के प्रथम कवि हैं जिन्होंने अवधी और खड़ी बोली दोनों का सबसे पहले प्रयोग किया। खुसरो की कविता में उनकी उदारता और हृदय की विशालता स्पष्ट झलकती है। वे एक सच्चे भारतीय थे।"
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत: द्विवेदी जी ने खुसरो के लोक-प्रेम को बहुत अहमियत दी। उनका मानना था— "खुसरो अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी और प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से एक थे। लेकिन उनका बड़प्पन इस बात में है कि उन्होंने अपने ज्ञान का बोझ आम जनता पर नहीं डाला, बल्कि आम जनता की खुशी और हंसी के लिए खुद को उनके स्तर पर ले आए। वे सच्चे अर्थों में लोककवि थे।"
- बाबू श्यामसुंदर दास का मत: बाबू श्यामसुंदर दास ने खुसरो की भाषा पर टिप्पणी करते हुए कहा है— "खुसरो ने उस समय खड़ी बोली में कविता की, जब उस भाषा का कोई साहित्यिक रूप तय नहीं था। भाषा के निर्माण और विकास में खुसरो का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।"
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले बड़े-बड़े विद्वानों और आलोचकों ने अमीर खुसरो को बहुत ही सम्मान की नजर से देखा है। आइए जानते हैं कि साहित्य के दिग्गजों ने खुसरो के बारे में क्या कहा है:
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत: हिंदी साहित्य के सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में अमीर खुसरो की तारीफ करते हुए लिखा है— "खुसरो की पहेलियां और मुकरियां बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें उक्ति-वैचित्र्य की प्रधानता थी। यद्यपि कुछ रसीले गीत और दोहे भी इन्होंने कहे हैं, पर इनकी प्रसिद्धि उसी उक्ति-वैचित्र्य के कारण है। जिस समय विद्यापति पदावली में श्रृंगार की लहरें उठा रहे थे, उस समय खुसरो ठेठ खड़ी बोली में पहेलियां बुझा रहे थे।" शुक्ल जी मानते थे कि खुसरो का मुख्य उद्देश्य आम जनता का मनोरंजन करना था, और इस काम में वो पूरी तरह सफल रहे।
- डॉ. रामकुमार वर्मा का मत: डॉ. वर्मा ने खुसरो के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है— "अमीर खुसरो ही हिंदी के प्रथम कवि हैं जिन्होंने अवधी और खड़ी बोली दोनों का सबसे पहले प्रयोग किया। खुसरो की कविता में उनकी उदारता और हृदय की विशालता स्पष्ट झलकती है। वे एक सच्चे भारतीय थे।"
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत: द्विवेदी जी ने खुसरो के लोक-प्रेम को बहुत अहमियत दी। उनका मानना था— "खुसरो अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी और प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से एक थे। लेकिन उनका बड़प्पन इस बात में है कि उन्होंने अपने ज्ञान का बोझ आम जनता पर नहीं डाला, बल्कि आम जनता की खुशी और हंसी के लिए खुद को उनके स्तर पर ले आए। वे सच्चे अर्थों में लोककवि थे।"
- बाबू श्यामसुंदर दास का मत: बाबू श्यामसुंदर दास ने खुसरो की भाषा पर टिप्पणी करते हुए कहा है— "खुसरो ने उस समय खड़ी बोली में कविता की, जब उस भाषा का कोई साहित्यिक रूप तय नहीं था। भाषा के निर्माण और विकास में खुसरो का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।"
खुसरो सिर्फ एक कवि नहीं, एक अहसास हैं
अमीर खुसरो सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज़ एक नाम नहीं हैं बल्कि वो एक ऐसा अहसास हैं जो आज भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में धड़कता है। जब कोई बच्चा अपनी दादी से पहेली पूछता है, जब किसी शादी में विदाई का दर्द भरा गीत बजता है, या जब सूफी कव्वालियां गाई जाती हैं — तो वहां कहीं न कहीं अमीर खुसरो मौजूद होते हैं।
उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए हमें यह सिखाया कि साहित्य सिर्फ रोने-धोने या बहुत गंभीर ज्ञान बघारने के लिए ही नहीं होता, बल्कि साहित्य वह है जो इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला दे, उसके दिमाग की कसरत कराए और दो अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों को आपस में प्रेम के धागे में पिरो दे।
अमीर खुसरो ने जब कहा था— "अपनी छबि बनाई के जो मैं पी के पास गई, जब छबि देखी पीहू की, सो अपनी भूल गई।" —तो यह सिर्फ भगवान और भक्त का मिलन नहीं था, बल्कि यह हिंदी साहित्य का वह खूबसूरत रूप था, जिसे देखकर आने वाली सदियों के कवि भी उसके दीवाने हो गए।
सच में, अमीर खुसरो हिंदी साहित्य के आसमान के वो चमकते हुए 'तारे' हैं, जिनकी रोशनी कभी मंदी नहीं पड़ सकती!
अमीर खुसरो सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज़ एक नाम नहीं हैं बल्कि वो एक ऐसा अहसास हैं जो आज भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में धड़कता है। जब कोई बच्चा अपनी दादी से पहेली पूछता है, जब किसी शादी में विदाई का दर्द भरा गीत बजता है, या जब सूफी कव्वालियां गाई जाती हैं — तो वहां कहीं न कहीं अमीर खुसरो मौजूद होते हैं।
उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए हमें यह सिखाया कि साहित्य सिर्फ रोने-धोने या बहुत गंभीर ज्ञान बघारने के लिए ही नहीं होता, बल्कि साहित्य वह है जो इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला दे, उसके दिमाग की कसरत कराए और दो अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों को आपस में प्रेम के धागे में पिरो दे।
अमीर खुसरो ने जब कहा था— "अपनी छबि बनाई के जो मैं पी के पास गई, जब छबि देखी पीहू की, सो अपनी भूल गई।" —तो यह सिर्फ भगवान और भक्त का मिलन नहीं था, बल्कि यह हिंदी साहित्य का वह खूबसूरत रूप था, जिसे देखकर आने वाली सदियों के कवि भी उसके दीवाने हो गए।
सच में, अमीर खुसरो हिंदी साहित्य के आसमान के वो चमकते हुए 'तारे' हैं, जिनकी रोशनी कभी मंदी नहीं पड़ सकती!
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